प्रसिद्ध पूर्णागिरी मेला प्रारम्भ, प्रतिदिन आ-जा रहे हैं हजारों श्रद्धालु।

टनकपुर (चम्पावत) : प्रसिद्ध पूर्णागिरी मेला प्रारम्भ हो गया है। यहाँ प्रतिदिन माँ पूर्णागिरी के दर्शनों के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु आने लगे हैं। टनकपुर तक बड़ी रेल लाइन बन कर प्रारम्भ हो गई है। रेल से भी हजारों श्रद्धालु प्रतिदिनआ-जा रहे हैं। मेले की बढ़ती रौनक से स्थानीय व्यापारियों के चेहरे खिल उठे हैं

पूर्णागिरि देवी मन्दिर हिमालय की तलहटी में नेपाल की सीमा पर शारदा नदी के किनारे बसे टनकपुर इस शहर से 18 किमी की दूरी पर एक पहाड़ी पर स्थित लाखों श्रद्धालुओं का आस्था का केंद्र है। श्रद्धालुओं का मानना है कि अन्नपूर्णा चोटी पर स्थित शक्तिपीठ में मां हर व्यक्ति की झोली भरती है।

इतिहासकारों के मुताबिक मां पूर्णागिरि मन्दिर को वर्ष 1632 ई. में श्रीचंद्रतिवारी ने बनवाया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान दक्ष ने अपने घर पर एक उत्सव का आयोजन किया। इसमें सिर्फ भगवान शिव को नहीं बुलाया गया। इस पर सती ने यज्ञ में कूदकर जान दे दी। इस पर भगवान शिव सीधे सती के पार्थिव शरीर के पास पहुंचे और क्रोध के साथ सती के पार्थिव शरीर को उठाये हुए पृवी पर घूमने लगे। बाद में भगवान विष्णु अपने चक्र से सती के शरीर को काटने लगे।

सती के शरीर के 52 टुकड़े पृथ्वी पर जहां-2 गिरे वहां-वहां देवी के मन्दिर बन गये। इन्हीं में से एक मन्दिर पूर्णागिरि देवी मन्दिर भी है। जहां देवी के शरीर का नाभि वाला भाग गिरा था। कुमाऊं के तत्कालीन राजा ज्ञानचंद ने यह जमीन श्रीचंद्र तिवारी को दान में दी थी। पूर्णागिरि की पवित्रता की बात महाभारत में भी वर्णित है ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने अपने निर्वासित जीवन के कुछ दिन इसी स्थान के आसपास जंगलों में बिताये थे।

यही नहीं शारदा के किनारे एक स्थान में ब्रहमदेव मंडी जिसके विषय में मान्यता है कि यहां भगवान ब्रह्मा ने यज्ञ किया था। ठुलीगाड के निकट परशुराम घाट पर बन देवी मन्दिर, भैरवचट्टी का दुर्गा मन्दिर और पूर्णागिरि देवी मन्दिर से लगभग 100 मीटर नीचे काली मन्दिर है जहां तीर्थयात्री पूजा करते हुए मुख्य मन्दिर तक पहुंचते हैं। काली मन्दिर से 570 सीढ़ियों को चढते ही पूर्णागिरि देवी मन्दिर का दर्शन हो जाते हैं। 

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *