राज्यसभा के उप-सभापति का चुनाव और गठबंधन की राजनीति : राजनीतिक विचारक डॉ. वेदप्रताप वैदिक का विश्लेषण

आज की स्थिति की तुलना 1977 से नहीं की जा सकती। यह ठीक है कि उस समय की जनता पार्टी में भी कोई पूर्व-घोषित प्रधानमंत्री नहीं था लेकिन उस समय सबको जोड़े रखने वाले प्रकाश-स्तंभ जयप्रकाश नारायण थे और स्वयं आपातकाल था। इस दृष्टि से भाजपा अपने को सुरक्षित समझ सकती है और राज्यसभा के उप-सभापति के चुनाव-परिणाम को इसका प्रमाण मान सकती है लेकिन वह यह न भूले कि सांसदों के वोट और जनता के वोट में जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है।

राज्यसभा के उप-सभापति चुनाव भाजपा-गठबंधन के उम्मीदवार हरिवंश की जीत ने भाजपा के मनोबल को और बढ़ा दिया है। हरिवंश ने कांग्रेसी उम्मीदवार बी.के. हरिप्रसाद को 20 वोटों से हरा दिया। पहले हरि को 125 वोट मिले और दूसरे हरि को 105 वोट। राज्यसभा के उप-सभापति के लिए प्रायः चुनाव नहीं होता है। उसे सर्वसम्मति से ही चुन लिया जाता है। पिछले चार दशकों से कोई न कोई कांग्रेसी सांसद ही इस पद पर रहता आया है लेकिन इस बार हरिवंश की जीत ने 2019 में होने वाले आम चुनावों के बारे में कई संकेत उभार दिए हैं।

सबसे पहला संकेत तो यही है कि कांग्रेस के मुकाबले गठबंधन कला में भाजपा कहीं अधिक सफल है। राज्यसभा में भाजपा-गठबंधन अल्पमत में है, उसके विरोधी बहुमत हैं लेकिन उसने फिर भी उन्हें मात कैसे दे दी ? भाजपा ने पहले तो अपने गठबंधन में शामिल उन दलों की सुधि ली, जो उससे नाराज चल रहे थे। उसके उम्मीदवार का समर्थन शिवसेना और अकाली दल ने भी किया। ओडिशा का बीजू जनता दल, जो कि भाजपा-गठबंधन का सदस्य नहीं है, उसके 9 सदस्यों ने भी हरिवंश का समर्थन किया। हरिवंश नीतीश के जनता दल युनाइटेड के सदस्य हैं। नीतीश ने नवीन पटनायक से समर्थन का आग्रह किया था। दोनों जनता दल हैं। दोनों जयप्रकाश आंदोलन की संतान हैं। इसके अलावा बी.के. हरिप्रसाद ओडिशा में कांग्रेस के प्रभारी थे। उन्होंने पिछले चुनाव में बीजू जनता दल से इतनी कटुता मोल ले ली थी कि नवीन पटनायक किसी भी हालत में तटस्थ नहीं रह सकते थे। यों भी ओडिशा में उनका मुकाबला कांग्रेस से ही होना है।

बीजू जनता दल की तरह हरिवंश का समर्थन अन्ना-द्रमुक के 13 और तेलंगाना राष्ट्र समिति के 6 सांसदों ने भी किया। भाजपा-गठबंधन का पलड़ा इसलिए भी भारी हो गया कि पीडीपी, आप और वायएसआर कांग्रेस पार्टियों के 7 सांसदों ने मतदान में भाग नहीं लिया। यदि वे सभी सांसद गठबंधन के उम्मीदवार का विरोध करते तो उसे 100 वोट मिलना भी मुश्किल हो जाता लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व ने न तो उदारता का परिचय दिया और न ही चतुराई का! उसे भाजपा से कुछ सबक सीखना चाहिए था। भाजपा के राज्यसभा में 50 सांसद हैं लेकिन वह लालच में नहीं फंसी। उसने अपनी पार्टी की बजाय अपनी एक सहयोगी पार्टी के सदस्य को उम्मीदवार बना दिया। जनता दल (यु) के सिर्फ छह सांसद हैं लेकिन उसे उप-सभापति पद देकर उन्होंने अपने बिहार-गठबंधन को इस्पाती शक्ल दे दी है। नीतीश पर भाजपा ने अहसान का इतना बड़ा टोकरा लाद दिया है कि 2019 में उनके इधर-उधर खिसकने की संभावनाएं निरस्त हो गई हैं। सिर्फ नीतीश के जनता दल ही नहीं, सभी छोटे-मोटे सहयोगी दलों के लिए भाजपा के इस कदम ने सौहार्द का वातावरण तैयार कर दिया है। इस घटना ने उनके घावों पर मरहम लगा दिया है।
हरिवंश को जो समर्थन मिला है, उसका एक बड़ा कारण उनका अपना व्यक्तित्व भी है। वे पढ़े-लिखे और समझदार व्यक्ति हैं। उन्होंने पिछले 25-30 साल हिंदी की यशस्वी पत्रकारिता की है। वे अपनी निष्पक्ष और मर्यादित पत्रकारिता के लिए जाने जाते रहे हैं। वे समाजवादी आंदोलन और जयप्रकाशजी से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी के साथ भी काम किया है। आज की अहंकारग्रस्त राजनीति में उनके-जैसा विनम्र और स्वच्छ उप-सभापति राज्यसभा के लिए अलंकार सिद्ध होगा। इसमें शक नहीं कि वैंकय्या नायडू और हरिवंश की जोड़ी भारत की इस राज्यसभा को सचमुच का उच्च सदन बना देगी।
इस चुनाव ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने कई चुनौतियां उपस्थित कर दी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यह आरोप लगाते कभी नहीं थकते कि नरेंद्र मोदी घोर अहंकारी नेता हैं लेकिन यदि कांग्रेस थोड़ी विनम्रता और उदारता का परिचय देती तो क्या उसकी प्रतिष्ठा और शक्ति बढ़ नहीं जाती ? क्या वह बसपा, सपा, बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, राकांपा या अन्ना-द्रमुक के किसी सुयोग्य और अनुभवी सांसद को इस पद के लिए खड़ा नहीं कर सकती थी ? तटस्थ दलों के नेताओं से नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जिस सलीके से बात की, उसका अभाव कांग्रेस में दिखा या नहीं ? यदि राहुल गांधी अब भी इस भुलावे में जीते रहे कि वे सबसे बड़े विरोधी दल के नेता हैं और शेष सभी दलों को उनका अनुसरण करना चाहिए तो 2019 में कांग्रेस की दाल कहीं और ज्यादा पतली न हो जाए।
लेकिन कांग्रेसी नेतृत्व की शिथिलता के बावजूद उसके उम्मीदवार हरिप्रसाद को 105 वोट मिल गए। ये क्या कम है ? कांग्रेस के राज्यसभा में जितने सदस्य हैं (50), उनके दुगुने से भी ज्यादा वोट उसे मिल गए ! इसका अर्थ क्या हुआ ? क्या यह नहीं कि विपक्ष की राजनीति की मूल शक्ति अब किसी अखिल भारतीय दल में नहीं, बल्कि प्रांतीय पार्टियों की एकजुटता में है। इन सब प्रांतीय दलों को जो एक सूत्र में बांध सके और जो प्रधानमंत्री पद के बारे में अनासक्त-सा हो, ऐसा कोई वरिष्ठ नेता यदि विरोधी दल खोज सकें तो वे 2019 में सत्तारुढ़ गठबंधन को टक्कर देने लायक हो सकते हैं।
भारत दुनिया का एक मात्र मूर्तिपूजक देश है। उसकी राजनीति आजकल सिद्धांतों और विचारधाराओं से नहीं चलती। उसकी जनता चुनाव के दौरान किसी एक मूर्ति को माला पहनाने के लिए बेताब हो जाती है। 2014 और 2019 में अब बहुत फर्क आ गया है। 2014 की वह लहर अब उतार पर है। लेकिन आज भी जनता के पास कोई विकल्प नहीं है। विपक्ष के पास आज भी कोई महामूर्ति नहीं है। विपक्ष के पास दर्जन भर से भी ज्यादा मूर्तियां हैं। वे एक-दूसरे की टांग खींचती नजर आती हैं। सत्ता का लालच यदि उन्हें एकजुट कर दे तो भी खास डर यही है कि चुनाव के बाद वे कितने दिन उस एकता को बनाए रखेंगे।
आज की स्थिति की तुलना 1977 से नहीं की जा सकती। यह ठीक है कि उस समय की जनता पार्टी में भी कोई पूर्व-घोषित प्रधानमंत्री नहीं था लेकिन उस समय सबको जोड़े रखने वाले प्रकाश-स्तंभ जयप्रकाश नारायण थे और स्वयं आपातकाल था। इस दृष्टि से भाजपा अपने को सुरक्षित समझ सकती है और राज्यसभा के उप-सभापति के चुनाव-परिणाम को इसका प्रमाण मान सकती है लेकिन वह यह न भूले कि सांसदों के वोट और जनता के वोट में जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है।
-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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