उच्च शैक्षिक संस्थानों में संस्कृत होगी अनिवार्य:धन सिंह

डॉ वाचस्पति मैठाणी को जन्मदिन पर याद किया
्देहरादून। पूर्व संस्कृत शिक्षा निदेशक, शिक्षाविद एवं गांधीवादी विचारों का अनुसरण करने वाले स्वर्गीय डॉ वाचस्पति  मैठाणी को उनके जन्मदिवस के अवसर पर संस्कृति विभाग की ओर से स्मरण किया गया। कार्यक्रम में सांस्कृतिक मंत्री धन सिंह रावत ने डॉ मैठाणी के संस्कृति भाषा में योगदान को अविस्मरणीय बताया। उन्होंने डॉ मैठाणी के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें संस्कृत भाषा को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिलाने का श्रेय भी दिया।
मंगलवार को प्रेस क्लब में संस्कृति विभाग की ओर से वाचस्पति डॉ मैठाणी के जन्मदिन पर उनका स्मरण किया गया। इस अवसर पर उनके द्वारा लिखी कई अहम पुस्तकों के संबंध में जानकारी दी गई। साथ ही संस्कृति भाषा के प्रचार-प्रसार और योगदान के बारे में बताया गया। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथ सांस्कृतिक मंत्री डॉ धन सिंह रावत ने कहा कि संस्कृत का ऐसा सेवक युगों में एकाध ही होता है। जिसने इस प्राचीन भाषा की दिल से सेवा की हो। मंत्री धन सिंह ने कहा कि संस्कृत भाषा को जल्द सभी उच्च शैक्षिक संस्थानों में अनिवार्य रूप से लागू किया जायेगा। जिन छात्रों के अभिभावकों की वार्षिक आय तीन लाख से कम है। ऐसे सौ छात्रों को मुफ्त पीएचडी की शिक्षा दी जायेगी। साथ ही आर्थिक तौर पर कमजोर और योग्य छात्रों को विभाग की ओर से नि:शुल्क कोचिंग दी जानी है। ऐसे छात्रों का सारा खर्चा सरकार उठाएगी। उनके लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था के लिए राज्य के पूर्व आईएएस अफसरों की एक कमेटी बनाई गई है। 
जो अपने अनुभवों के साथ इन छात्रों को पढ़कार उन्हें देशसेवा के लिए तैयार करेंगे। कहा कि ज्ञान और विज्ञान दोनों ही संस्कृत के बिना अधूरे हैं। संस्कृत प्रचीन भाषा के साथ ही प्राचानी सभ्यता से भी अवगत कराती है। उन्होंने कहा कि डॉ मैठाणी ने पर्वतीय क्षेत्रों में छात्रों की परीक्षा में नकल पर रोक लगाने का दृढ़ संकल्प लिया। इस दौरान उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई। संस्कृत भाषा के प्रति उनका समर्पण देखते हुए राज्य सरकार ने उन्हें संस्कृत शिक्षा निदेशक की जिम्मेंदारी दी। सेनानिवृत होने के बाद उन्होंने सेंदुल, केमर, टिहरी गढ़वाल में बालिक स्नाकोत्तर, संस्कृत महाविद्यालय व देहरादून में विश्व के प्रथम प्राथमिक संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। डॉ मैठाणी संस्कृत के प्रचार-प्रसार एवं भारतीय सभ्यता के लिए सदैव तत्पर रहे। विधायक उमेश चंद्र शर्मा, पूर्व शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी, प्रोफेसर वेद प्रकाश शास्त्री, पूर्व विधायक भीम लाल आर्य, प्रोफेसर पीयूष कांत दीक्षित, डॉक्टर भगवती प्रसाद मैठाणी, मनोज द्विवेदी, बिहारी लाल आदि मौजूद रहे।

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