एनडी तिवारी के दौर को दोहरायेंगे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत

 

देहरादून। आशीष बडोला। उत्तराखण्ड की राजनीति का अतीत कुछ बया करता है। जिसें देखकर राजनीति विशेषज्ञ कहते हैं, सूबें में एक ही मुखिया का टिके रहना काफी मुश्किल है। आज ब्रेनहैमरेज से जुंझ रहे एनडी तिवारी कभी पांच साल जरूर मुख्यमंत्री रहे थे। उनके टिके रहने की खास वजह यह थी कि वो केंद्रीय नेतृत्व जैसा ही दमखम रखते थे, आपकों बता दे कि एनडी तिवारी इंद्रागांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए काफी करीबी थे।

 

जब इंद्रागांधी प्रधानमंत्री रहते हुए दून स्थित सर्किट हाउस आती थी, तो पूरे यूपी से उनके सबसे करीबी एनडी तिवारी ही होते थे। जिसका लाभ उन्हें अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान मिला भी है। हालांकि एनडी तिवारी निजी स्वभाव के चलते मीडिया की सुर्खियों में रहे। ऐसा शायद ही त्रिवेंद्र काल में हो।

 

वहीं त्रिवेंद्र रावत की राजनैतिक कहानी कुछ अलग है पांच साल तो विधायक भी नहीं रहे। इसी दौरान एक उपचुनाव डोईवाला से भी हारे। मगर धैर्य नहीं छोड़ा एकदम सबकों चैकाते हुए मुखिया बन गए। उन्हें मुख्यमंत्री बने सिर्फ 6 महीने हुए हैं, ये उनकी खुदकिस्मती ही है कि उनके कार्यकाल में ऐतिहाासिक 57 सीटों का बंपर बहुमत पूरा उनके पाले में होना जरूरी नहीं है, यदि 20 इधर-उधर भी चले जाए तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता, शायद ही ऐसा राजयोग किसी मुख्यमंत्री का सूबें में रहा हो।

 

हां एनडी तिवारी ऐसे मुख्यमंत्री जरूर थे जो अपना राजयोग खुद बनाना जानते थे, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था, कोई उनके लिए क्या सोचता है। जिसकों लाल बत्ती देनी हो, वो जरूर देते, निजी जीवन में उनके कई मामलें मीडिया के सामने आएं मगर उन्हें इसका जरा भी असर नहीं पड़ा। उत्तराखण्ड क्या उत्तरप्रदेश में भी उन्हें खूब सम्मान पूर्व सीएम अखिलेश और मुलायम सिंह ने दिया। ऐसे कुछ ठाट मोदी युग में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के दिख रहे हैं। अमितशाह के दौरे ने भी मुख्यमंत्री को पूर्ण आश्वस्त कर दिया है कि वो ही पूरे पांच साल सूबें के मुखिया रहेंगे।

 

साथ ही शाह ने ये भी कहा है कि किसी भी तरह की ढ़ील बर्दाश नहीं कि जाएगी। जो गलत करें उसके खिलाफ एक्सन लिया जाए। चलों ये तो साफ है त्रिवेंद्र ही मुख्यमंत्री रहेंगे, मगर एनडी सरकार में मंत्री रह चुके नेतागण क्या अब चुप बैठ पाएंगे। वो तो स्वभाव में ही प्रचंडता रखते हैं। ऐसे में सरकार को अपनी लाज बचाने पर विशेष ध्यान रखना होगा। कुछ नेतागण तो ऐसे हैं जो पवित्र नदियों कि भी झूठी कसम खा लेते हैं। त्रिवेंद्र रावत को बेफिक्र रहते हुए खुलकर जनहित में निर्णय लेने होंगे, भविष्य तो कोई नहीं जानता, मगर इतना जरूर है जैसे स्वतंत्र होकर फैसले एनडी तिवारी निजी तौर पर लेते थे,

 

वहीं त्रिवेंद्र प्रचंड बहुमत में राज्य का भला जरूर कर सकते हैं, ऐसे में उन्हें मेहमानों से कतई भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। अब तो उन पर साक्षात कृष्ण का आशीर्वाद हैं, जो पिछले दो दिनों में प्रदेश भाजपा को आत्मविश्वास की बूटी पिलाकर दिल्ली रवाना हो गए। इन दिनों एनडी भी जीवन के अंतिम पड़ाव पर दिख रहे हैं, मगर ये सच है राजनीति और कूटनीति का ऐसा प्रकांड ब्राहम्ण इस देवभूमि को फिर मिल सकें, जो उत्तराखण्ड सहित कई राज्यों के शीर्ष पदों पर विराजमान हुआ हो। हां कहना शायद थोड़ा मुश्किल होगा।

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