पौड़ी में बच्चों को स्थानीय भाषा सिखाने पर दिया जा रहा जोर


पौड़ी। संवाददाता। दक्षिण भारत और दिल्ली में त्रिभाषा फ़ॉर्मूले पर हुए विवाद से दूर पौड़ी में भाषा को लेकर एक प्रयोग ख़ामोशी से हो रहा है। अंग्रेज़ी पढ़ाने के दबाव के बीच मातृभाषा में शिक्षा देने का कोशिश पौड़ी ब्लॉक से शुरु हुई है। राज्य में पहली बार पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं के लिए गढ़वाली में स्थानीय परंपराओं, उत्तराखंड के हीरो, लोक संस्कृति के बारे में जानकारी देती हुई किताबें तैयार की गई हैं। प्रयास यह है कि नई पीढ़ी अपनी बोली, संस्कृति से जुड़ी रहें।

पलायन से बढ़ी चिंता
गैर हिंदी राज्यों में स्थानीय भाषाएं पाठ्यक्रमों का हिस्सा हैं और इसका असर इन समाजों में भी नज़र आता है. लेकन उत्तराखंड में चिंता का विषय यह भी है कि यहां की नई पीढ़ी अपनी बोली-संस्कृति से दूर होती जा रही है। इसलिए पौड़ी के ज़िलाधिकारी डीएस गबरियाल की पहल पर विषय विशेषज्ञों की टीम ने पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं के लिए गढ़वाली पुस्तकें तैयार की हैं।

इनके नाम भी प्रचलित स्थानीय आभूषणों पर रखे गए हैं. पहली क्लास की किताब का नाम है- धगुलि, दूसरी के लिए है हंसुलि, तीसरी के लिए छुबकी, चौथी के लिए पैजबी और पांचवीं क्लास के लिए झुमकि. पाठ्यक्रम समिति के संयोजक गणेश खुगशाल गणी कहते हैं कि पूरी कोशिश की गई है कि गढ़वाली की इन किताबों का स्तर किसी भी दूसरे पाठ्यक्रम की पुस्तक से अलग कमतर हो।

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