यहां तप करके भोलेनाथ कहलाये नीलकंठ


देहरादून। संवाददाता। नीलकंठ महादेव के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से शिव भक्त ऋषिकेश में नीलकंठ धाम पहुंचते हैं। पहाड़ और जंगल के बीच बसे इस स्थान पर भगवान शिव खुद विराजमान हैं। पौराणिक मान्यता है कि यही वो स्थान है जहां भगवान शिव ने अपने कंठ में विष धारण कर तपस्या की थी। भगवान शिव ने विष को कंठ में धारण कर संसार को बड़ी विपदा से बचा लिया और वो नीलकंठ महादेव कहलाये। आज सावन के पहले सोमवार को नीलकंठ महादेव का दर्शन करने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा है। मान्यता है कि यहां शिव भक्त द्वारा की गई प्रार्थना और मनोकामनाएं सभी पूरी हो जाती हैं।

मणि कूट पर्वत पर है नीलकंठ धाम
मणि कूट पर्वत के शीर्ष पर स्थित है भगवान शिव का पौराणिक नीलकंठ धाम जहां सावन के महीने में बड़ी संख्या में शिव भक्त कावड़ लेकर जल चढ़ाने पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां पर भगवान शिव ने समुद्र मंथन में निकले विष से धरती को बचाने के लिए विष को अपने कंठ में धारण कर तपस्या की थी। भगवान शिव ने विष को कंठ में धारण कर संसार को बड़ी विपदा से बचा लिया. विष की तेज़ पीड़ा से भोलेनाथ के शरीर में बेचैनी होने लगी और वो इधर उधर जाने लगे। उन्हें मणि कूट पर्वत पर विष की तेज़ जलन से शांति मिली।

भगवान शिव को मणि कूट पर्वत पर विष की तेज़ जलन से शांति मिली
यहीं पर तप करके भगवान ने विष के प्रभाव को ख़त्म कर दिया। विष को कंठ में धारण करने से शिव का कंठ नीला पड़ गया और वो नीलकंठ कहलाये। सावन के महीने में और चतुर्मास के दौरान शिव परिवार की आराधना की जाती है। इन चार महीनों में शिव परिवार पर ही पूरी सृष्टि को चलाने की जिम्मेदारी रहती है। यही कारण है कि सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा की जाती है।

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