औषधीय गुणों का खजाना माने जाने वाला उत्तराखंड का राज्य वृक्ष बुरांश इस बार बसंत के आगमन से पहले ही खिल गया है। जनवरी मध्य से पहले बुरांश के फूल खिलने की यह असामान्य घटना केवल एक प्राकृतिक बदलाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों की ओर स्पष्ट संकेत कर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, असमय खिलने से बुरांश की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिसे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी गंभीर खतरा माना जा रहा है।
सामान्य रूप से समुद्रतल से 1500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर उगने वाला बुरांश मार्च–अप्रैल माह में खिलता है। इसी दौरान पहाड़ों की ढलानों पर बुरांश पूरे यौवन पर होता है और अपने गहरे लाल रंग से पहाड़ियों को लालिमा से ढक देता है। लेकिन इस वर्ष तापमान में बढ़ोतरी और मौसम के बदलते पैटर्न के कारण बुरांश जनवरी में ही खिलने लगा है, जो चिंताजनक माना जा रहा है।
महिलाओं की आजीविका पर भी असर
पर्वतीय क्षेत्रों में बुरांश महिलाओं की आर्थिकी का एक महत्वपूर्ण साधन है। जंगल से चारा-पत्ती लाने के दौरान महिलाएं बुरांश के फूल तोड़कर घर पर जूस और स्क्वैश तैयार करती हैं, जिसे स्थानीय बाजारों में बेचा जाता है। असमय फूल खिलने से उत्पादन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव के चलते कई परिवारों की आजीविका पर संकट खड़ा हो सकता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
राजकीय महाविद्यालय ब्रह्मखाल के प्रधानाचार्य प्रो. रूकम सिंह असवाल का कहना है कि तापमान में लगातार वृद्धि और मौसम के पैटर्न में हो रहे बदलाव के कारण बुरांश अपने सामान्य समय से पहले खिल रहा है। यह स्थिति भविष्य में पारिस्थितिकी तंत्र के लिए घातक साबित हो सकती है। इससे न केवल फूलों की गुणवत्ता प्रभावित होगी, बल्कि उत्पादन में भी गिरावट आ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की इस प्रवृत्ति पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो पहाड़ी क्षेत्रों की जैव विविधता और उससे जुड़े पारंपरिक रोजगारों पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

