Monday, March 9, 2026
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जोशीमठः शादी के लिए सजे घर पर लगा लाल निशान, खुशी के मौके पर छोड़ना पड़ा घर, छलकी आंखें

जोशीमठ : शादी के लिए सजे घर पर लगा लाल निशान, खुशी के मौके पर छोड़ना पड़ा घर, छलकी आंखें

जोशीमठ। दरक रहे जोशीमठ के सिंहधार में बिष्ट परिवार के दो मंजिला घर के बाहर दीवारों पर चमक तो पूरी है, लेकिन अंदर से गहरी दरारें अभर आई हैं। जिन दीवारों को हफताभर पहले ही सुदर रंगों से सजाया गया, वहां खतरे का लाल निशान लग चुका है। शादी की तैयारियों में जुटा दूल्हा और उसका परिवार घर छोड़ने के लिए सामान समेटने में लगा है। अब शादी हो पाएगी भी या नहीं इसपर भी संशय बना हुआ है।

शादी जीवन के एक बड़े संस्कार में शामिल है। बात जब बेटे की शादी की हो तो साल-छह महिने पहले से ही घर में खुशी और उत्साह के साथ तैयारियां शुरू हो जाती हैं। ऐसे में कोई अप्रत्याशित मुसीबत आ जाए तो पूरा माहौल बदल जाता है। सेना से रिटायर सलूर डूंगा के पुष्कर सिंह बिष्ट ने 2001 में सिंहधार में मकान बनाया । इसी घर में बडे बेटे प्रदीप की शादी की। पौता-पौती की किलकारियां गूंजी। बेटियों के हाथ पीले किए। अब 26-27 फरवरी को छोटे बेटे जयदीप की शादी भी धूमधाम से होनी थी। लगभग सारी तैयारियां हो चुकी हैं। टैंट, हलवाइ, बैंड, कैमरामैन, घोड़ेवाला, गाड़ियां बुक हो चुकी हैं। लाख रूपये से ज्यादा एडवांस दे चुके हैं।

नगर पालिका का मैरिज हाॅल भी बुक कराया है। अंधेरा महीना चल रहा था, इसलिए 15 जनवरी को संक्रांति के बाद शादी के कार्ड छपवाने थे। इससे पहले ही भूं-धंसाव के कारण मुसीबत टूट पड़ी। उनका घर होटल मलारी इन के नीचे है, जिसे तोड़ा जाना है। उनके मकान के एक हिस्से में चैड़ी दरारें आ चुकी हैं। इस कारण घर खाली कराया गया। बच्चों समेत आठ सदस्यों के परिवार को संस्कृत महाविद्यालय में शरण लेनी पड़ी। आम्र्ड फोर्स में तैनात बड़े बेटे प्रदीप ने बताया कि जोशीमठ की दशा जानकार इमरजेंसी में छुट्टी लेकर आना पड़ा। प्रशासन ने घर की नापजोख की है। बताया जा रहा है कि लाल निशान वाले घर तोड़े जाएंगे।

खुशी के मौके पर परिजनों की आंखें नम
दूल्हा बनने जा रहे जयदीप बिष्ट प्रशासन के अल्टीमेटम के बाद अपना सामान समेट रहे थे। जयदीप जोशीमठ में ही नौकरी करते हैं। घर छोड़ने के लिए कपड़े बैग में भर रहे थे। भाई प्रदीप और पिता पुष्कर सिंह फर्नीचर आदि सुरक्षित कमरे में भर रहे थे। मां भुवनेश्वरी देवी भी चिंतित थीं। क्या सामान ले जाएं, क्या छोड़ें इसे लेकर परेशान थीं। भाभी और बहन की आंखें नम थी। अपना घर छोड़ने का दुख चेहरों पर साफ झलक रहा था।

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