Saturday, March 7, 2026
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तपोवन विष्णुगाड तक 50 मिनट में पहुंची जलप्रलय, अध्ययन में सामने आई ये बातें

बीती सात फरवरी को चमोली के ऋषिगंगा कैचमेंट से निकली जलप्रलय को तपोवन विष्णुगाड पनबिजली परियोजना तक पहुंचने में महज 50 मिनट लगे। यह समय इतना कम था कि किसी को कुछ समझने और कुछ करने का समय नहीं मिल पाया। यह कहना है, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआइ) के उस विज्ञानी दल का, जो आपदा के कुछ दिन बाद से ही इसके कारणों की पड़ताल में जुट गया था। जीएसआइ के वरिष्ठ विज्ञानी डा. सत्य प्रकाश शुक्ला के नेतृत्व वाले दल ने अपनी रिपोर्ट केंद्रीय मुख्यालय को सौंप दी है।

जीएसआइ के केंद्रीय मुख्यालय के जियोहैजार्ड रिसर्च एंड मैनेजमेंट (जीएचआरएम) सेंटर के निदेशक डा. सैबल घोष के मुताबिक, फरवरी माह में मौसम सर्द रहता है और इसके बाद भी हिमस्खलन के चलते आपदा घटित होना, किसी आश्चर्य से कम नहीं। हालांकि, इससे यह भी पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के चलते सर्दी के मौसम में भी तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव हो रहा है, क्योंकि जलप्रलय से पहले चार व छह फरवरी को संबंधित क्षेत्र में बड़ी मात्रा में बर्फ पड़ी। ऋषिगंगा नदी के समीप रौंथी पर्वत पर जिस चट्टान पर ठोस रूप में बर्फ जमा थी, उसके ऊपर ताजी बर्फ पड़ती रही और इसके बाद चट्टान व बर्फ दोनों एक साथ नीचे आ गिरे।करीब 1800 मीटर की सीधी ऊंचाई से 400 मीटर गुणा 700 गुणा 150 के आकार में बर्फ व चट्टान नीचे ऋषिगंगा में जा गिरे। टक्कर इतनी जोरदार थी कि पूरी बर्फ पलभर में पानी बन गई। हालांकि, यह पानी सीधा निचले क्षेत्रों में नहीं गया और पहले ऋषिगंगा नदी पर बर्फ/पानी व मलबे के चलते एक कृत्रिम झील बन गई। फिर कुछ ही देर में झील टूट गई और पानी व मलबा पूरे वेग के साथ निचले क्षेत्रों में कहकर बनकर टूटता चला गया। जीएचआरएम सेंटर निदेशक डा. घोष के मुताबिक, निचले क्षेत्र में घाटी बेहद संकरी है और इसके चलते जलप्रलय का वेग और तीव्र होता चला गया।अध्यन रिपोर्ट में जीएसआइ के विज्ञानियों ने कहा कि है चमोली का उच्च हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। ऋषिगंगा से निकली जलप्रलय के बाद अब भविष्य में भी यहां इस तरह की आपदा आने की आशंका बढ़ गई है। लिहाजा, इस तरह के उच्च क्षेत्रों में बड़े निर्माण कार्यों के दौरान विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि जहां बर्फ पड़ती और पिघलती रहती है, विशेषकर वहां की चट्टानों के जोड़ खासे कमजोर पड़ जाते हैं।

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