Sunday, March 8, 2026
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फूलदेई संक्रांति आज, देवभूमि में महक रहीं घरों की दहलीज

देहरादून : उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा से जुड़ा पर्व फूलदेई आज से मनाया जा रहा है। गढ़वाल व कुमाऊं में विशेष रूप से मनाया जाने वाले इस पर्व पर सुबह फुलारी यानी छोटे बच्चों ने देहरी पूजन कर फूलों से सजाया। अष्टमी के दिन इन फुलारी को लोग मिष्ठान भेंट करेंगे।

पर्वतीय अंचलों में ऋतुओं के अनुसार पर्व मनाए जाते हैं। यह पर्व जहां हमारी संस्कृति को उजागर करते हैं, वहीं पहाड़ की परंपराओं को भी कायम रखे हुए हैं। इन्हीं में शामिल फूलदेई पर्व। वसंत ऋतु के आगमन की खुशी में चैत्र मास की संक्रांति पर आज उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।

देहरादून में भी विभिन्न कालोनियों में बच्चों ने देहरी पूजा की। कई सामाजिक संगठन चित्रकला, नृत्य, गीत आदि प्र्रतियोगिता शुरू करेंगे।

कूर्मांचल सांस्कृतिक एवं कल्याण परिषद के अध्यक्ष कमल रजवार ने बताया कि सुबह गढ़ी कैंट क्षेत्र में बच्चों द्वारा आसपास घरों के देहरी पर फूल, चावल से सजाया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री आवास में भी फूलदेई पर कार्यक्रम होगा।

यह है धार्मिक महत्ता
उत्तराखंड विद्वत सभा के प्रवक्ता आचार्य विजेंद्र प्रसाद ममगाईं के अनुसार, इस बारे में कथानुसार एक बार भगवान शंकर तपस्या में लीन हो गए। कई ऋतु चली गई। ऐसे में देवताओं और गणों की रक्षा के लिए मां पार्वती ने चैत्र मास की संक्रांति के दिन कैलाश पर घोघिया माता को पुष्प अर्पित किए। इसके बाद से ही चैत्र संक्रांति पर फूलदेई का पर्व मनाया जाने लगा।

धाद ने शुरू किया फूलदेई अभियान
पर्यावरण संरक्षण पर कार्य करने वाली धाद संस्था की ओर से फूलदेई अभियान शुरू हो गया। धाद के सचिव तन्मय ममगाईं ने बताया कि एक महीने तक चलने वाले इस अभियान के तहत राज्य के विभिन्न स्कूलों में बच्चों द्वारा चित्रकला, कविता, कहानी प्रतियोगिता होंगी। इसके अलावा संस्था के सदस्य बाल कवि सम्मेलन, बाल साहित्य पर चर्चा, मातृभाषा में बाल साहित्य पर आनलाइन विमर्श करेंगे।

इस तरह मनाते हैं फूलदेई
अखिल गढ़वाल सभा के महासचिव गजेंद्र भंडारी बताते हैं कि फूलदेई के दिन छोटे-छोटे बच्चे सुबह ही उठकर फ्योंली, बुरांस, बसिंग आदि जंगली फूलों के अलावा आड़ू, खुमानी, पुलम, सरसों के फूलों को चुनकर लाते हैं।

थाली अथवा रिंगाल से बनी टोकरी में चावल व इन फूलों को सजाकर बच्चों की टोली घर-घर तक पहुंचती है। पर्व के मौके पर बच्चे लोकगीत गाकर सुख-शांति की कामना करते हैं। इसके बदले में परिवार के सदस्यों द्वारा उन्हें चावल, गुड़ व पैसे दिए जाते हैं। इस पर्व का बच्चों को बेसब्री से इंतजार रहता है।

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