Sunday, March 8, 2026
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उत्तराखंड में इस बार भी भाजपा, कांग्रेस के बीच ही होगा मुकाबला, यूकेडी सहित औरो की हालत पतली

राज्य निर्माण के बाद अब तक जितने भी आम चुनाव हुए हैं उनमें यहां राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस का ही दबदबा रहा है और पृथक राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाले क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) सहित अन्य सभी दलों का प्रदर्शन फीका रहा है। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग हुए उत्तराखंड में लोकसभा की पांच सीटें हैं जिन पर फिलहाल भाजपा काबिज है।

राज्य के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो केवल एक बार वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की एक सीट पर गैर—भाजपा और गैर—कांग्रेसी उम्मीदवार चुना गया। उस समय समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी राजेंद्र सिंह ने हरिद्वार से विजय प्राप्त की थी। उसके अलावा, अन्य सभी चुनावों में बाजी भाजपा या कांग्रेस के हाथ लगती रही है। 

देहरादून : उत्तराखंड में चुनावों में इस बार पहली दफा समाजवादी पार्टी ने अपना कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा है। चुनावी आंकड़े राज्य में मुख्यत: कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवारों की जीत की कहानी सुनाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा का उम्मीदवार इनके गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब रहा था। उत्त्तराखंड में पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है। राज्य निर्माण के बाद अब तक जितने भी आम चुनाव हुए हैं उनमें यहां राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस का ही दबदबा रहा है और पृथक राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाले क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) सहित अन्य सभी दलों का प्रदर्शन फीका रहा है। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग हुए उत्तराखंड में लोकसभा की पांच सीटें हैं जिन पर फिलहाल भाजपा काबिज है। राज्य के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो केवल एक बार वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की एक सीट पर गैर—भाजपा और गैर—कांग्रेसी उम्मीदवार चुना गया। उस समय समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी राजेंद्र सिंह ने हरिद्वार से विजय प्राप्त की थी। उसके अलावा, अन्य सभी चुनावों में बाजी भाजपा या कांग्रेस के हाथ लगती रही है।

भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर अन्य सभी दलों का उत्तराखंड में समर्थक आधार बहुत कम है। यही कारण है कि यहां हर बार भाजपा या कांग्रेस को ही विजय मिलती रही है। नब्बे के दशक में क्षेत्रीय दल उक्रांद ने पृथक राज्य आंदोलन की अगुवाई की लेकिन चुनावों में वह कभी अपना महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं छोड़ पायी। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी प्रदेश के मैदानी इलाकों तक ही सीमित रहीं और केवल विधानसभा चुनावों में ही कुछ सीटें अपने नाम कर पायीं। वामपंथी दलों की भी राज्य की जनता पर पकड़ नहीं बन पायी। पृथक राज्य आंदोलन के प्रखर नेता और उक्रांद के अध्यक्ष दिवाकर भट्ट ने इस संबंध में पूछे जाने पर कहा,  ‘हमें उम्मीद है कि इस बार हमारा प्रदर्शन बेहतर रहेगा।’  पिछले आम चुनावों में ज्यादातर बार उक्रांद के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी।

हालांकि, भट्ट का कहना है कि तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद पार्टी इस बार भी प्रदेश की पांचों संसदीय सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वर्ष 2004 में एक सीट जीतने के बावजूद समाजवादी पार्टी उत्तराखंड में 2009 और 2014 के चुनावों में ज्यादातर सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार कर भी अपना खाता नहीं खोल पायी। इस बार बसपा—सपा गठबंधन के तहत सीटों के बंटवारे में सपा को पौडी सीट मिली थी लेकिन कोई योग्य उम्मीदवार न मिलने के कारण उसने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। पहले चर्चा थी कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव यहां से चुनाव लड़ सकती हैं। डिंपल की पैदाइश उत्तराखंड की है। लेकिन अंतिम समय में पार्टी ने पौडी से कोई प्रत्याशी घोषित नहीं किया। इसी प्रकार, बसपा को भी चुनावों में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। आम चुनावों में बसपा के हाथ भी कभी कोई सीट नहीं लगी है। बसपा ने 2002 के पहले विधानसभा चुनावों में सात सीटें जीतीं, लेकिन उसके बाद पार्टी के प्रदर्शन का ग्राफ गिरता चला गया। बसपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘इस बार हम चार सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं और हमें उम्मीद है कि हमें सफलता जरूर मिलेगी।’ 

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