Sunday, March 8, 2026
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पंचायत चुनाव में यूकेडी तलाशेगी अपना वजूद


देहरादून। संवाददाता। त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में प्रदेश का एकमात्र क्षेत्रीय राजनीतिक दल उत्तराखंड क्रांति दल यानी कि यूकेडी भी अपनी ज़मीन तलाश रहा है. उत्तराखंड की राजनीति में हाशिए पर चला गया यूकेडी नई पीढ़ी में अपना जनाधार बनाने की कोशिश में है और पहाड़ी इलाक़ों में ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ज़िला पंचायत में बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतार रहा है. पार्टी नेता कहते हैं कि यूकेडी ने अपनी ग़लतियों से सीखा है और उन्हें दूर कर अब नए जोश के साथ मैदान में उतर रही है. पंचायत चुनावों के साथ ही पार्टी अपनी तैयारियों, अपनी ताकत-कमज़ोरियों का पता लगाएगी और फिर शक्ति बटोरकर विधानसभा चुनावों में उतरेगी।

 

उत्तराखंड क्रांति दल प्रदेश का अकेला ऐसा राजनीतिक दल है जो उत्तराखंड आंदोलन में शामिल रहा है, आंदोलन का नेतृत्व किया है। लेकिन अलग राज्य बनने के बाद से यह धीरे-धीरे प्रभावहीन होता गया है। यूकेडी के प्रवक्ता सुनील ध्यानी इस बात को स्वीकार करते हैं कि यूकेडी का वह स्थान नहीं रहा जो राज्य के लिए उसके संघर्ष की वजह से बनना चाहिए था। ध्यानी कहते हैं उन्हें यह स्वीकारने में झिझक नहीं है कि इसके लिए खुद यूकेडी की कमियां, नेताओं की ग़लतियां ज़िम्मेदार रहीं।

सुनील ध्यानी कहते हैं कि 1994 में जब अलग राज्य आंदोलन के लिए संयुक्त संघर्ष समिति बनाई गई उसमें पहाड़ के गांधी इंद्रमणि बडोनी ने सबका स्वागत किया। इसमें कांग्रेस-भाजपा के लोग भी आए लेकिन अपने स्वार्थ छोड़कर नहीं। जब 1996 में संयुक्त संघर्ष समिति ने राज्य नहीं तो चुनाव नहीं का निर्णय सामूहिक रूप से लिया तो ये सभी अपने-अपने दलों में जाकर चुनाव लड़े और यूकेडी अकेले रह गई जबकि उस समय जनता का इतना ज़बरदस्त समर्थन था कि पार्टी पांचों सीट जीत सकती थी।

1996 से ही पार्टी में टूट का सिलसिला शुरु हो गया और पार्टी में दो फाड़ हो गए। दिवाकर भट्ट और पूरण सिंह डंगवाल अलग हो गए। ध्यानी कहते हैं कि इसके बाद बड़ी ग़लती 2002 में हुई जिसे राजनीतिक अपरिपक्वता कहना ही ठीक होगा। फिर पार्टी में टूट हुई और दिवाकर भट्ट, काशी सिंह ऐरी ने अपनी-अपनी पार्टी बना ली। 2007 में पार्टी नेताओं ने फिर कमज़ोरी दिखाई। भाजपा के साथ सरकार में सहयोगी दल के रूप में पार्टी ने अपने एजेंडे को मनवाने के लिए दबाव देने के बजाय नेताओं ने अपने स्वार्थ और अहम को महत्व दिया. नतीजा- पार्टी फिर टूटी। दिवाकर सिंह भट्ट अलग चले गए और प्रीतम सिंह पंवार अलग

नेताओं की राजनीतिक अपरिपक्वता की वजह से यूकेडी ने ग़लतियां की उससे जनता का पार्टी से विश्वास उठ गया। हालांकि कांग्रेस और बीजेपी ने इससे बड़े राजनीतिक ब्लंडर किए (जैसे कि 2016 में हरीश रावत सरकार का गिराना) लेकिन दोनों ही पार्टियों को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा और न ही जनता को पर यूकेडी के लिए अपनी ग़लतियों से उबरना मुश्किल हो गया।

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