Saturday, March 7, 2026
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उत्तराखण्ड मूल के पहले शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज को दी गई जलसमाधि; कल चंडीगढ़ में हुआ था शरीर शांत

 

देहरादून (संवाददाता) : ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पद पर आसीन दण्डी स्वामी माधवाश्रम महाराज ने शरीर त्याग दिया है। लंबे समय से बीमार चले रहे माधवाश्रम महाराज ने कल शुक्रवार को चंडीगढ़ में अंतिम सांस ली।

शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज भारत के बदरीनाथ तीर्थ के समीप जोशीमठ तीर्थ स्थित ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य थे। वर्ष 1993 से ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पद पर आसीन माधवाश्रम महाराज ने शुक्रवार को चंडीगढ़ में देह त्याग दिया। महाराज लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके पार्थिव शरीर को देर शाम तक ऋषिकेश स्थित दंडीबाड़ा आश्रम में लाया गया। पार्थिव शरीर को ऋषिकेश स्थित दण्डीबाड़ा श्रीजनार्दन आश्रम में आम लोगों के दर्शनार्थ के लिए रखने के बाद विधि विधान के साथ आश्रम में जलसमाधि दी गई। उनके अनुयायियों तीर्थनगरी पहुंच उनके अंतिम दर्शन किये। स्वामी जी उत्तराखण्ड मूल से शंकराचार्य के पद पर सुशोभित होने वाले पहले संन्यासी थे। वे अखिल भारतीय धर्म संघ समेत विभिन्न धार्मिक संस्थाओं के अघ्यक्ष एवं सदस्य रहे।

केशवानन्द से बने माधवाश्रम और शंकराचार्य

शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज का जन्म उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के अन्तर्गत बेंजी ग्राम में हुआ था। इनका मूल नाम केशवानन्द था। आरम्भिक विद्यालयी शिक्षा के पश्चात इन्होंने हरिद्वार, अम्बाला में सनातन धर्म संस्कृत कॉलेज, वृंदावन में बंशीवट में श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के आश्रम एवं वाराणसी समेत देश के विभिन्न स्थानों पर वेदों एवं धर्मशास्त्रों की दीक्षा ली और संन्यास ग्रहण किया। स्वामी माधवाश्रम महाराज की विद्वता को देखते हुए धर्म संघ के तत्वाधान में धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी के आशीर्वाद से जगन्नाथ पुरीपीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ जी ने उन्हें ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किया। तब से वे इस परम्परा का बखूबी पालन कर रहे थे। शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज धर्मप्रचार एवं गौहत्या विरोधी विभिन्न आंदोलनों एवं संगठनों से जुड़े थे।

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