Saturday, March 7, 2026
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कभी किंगमेकर रहा उक्रांद, आज वजूद के लिए कर रहा संघर्ष

उत्तराखंड राज्य का गठन लंबे संघर्षों और शहादत की बुनियाद पर हुआ है। जिसमें उत्तराखंड क्रांति दल की अहम भूमिका रही, लेकिन राज्य गठन के 21 साल बाद भी यूकेडी प्रदेश में एक सशक्त क्षेत्रीय दल के तौर पर नहीं उभर सकी है। जो कभी किंगमेकर था, वह आज अपने अस्तित्व के लिए तरस रहा है।   उत्तराखंड क्रांति दल राज्य के जनसंघर्षों की एक उपज है। जिसका गठन 25 जुलाई 1979 में मसूरी में हुआ। यूपी के दौरान 1980 में रानीखेत विधानसभा सीट से जसवंत सिंह बिष्ट दल के पहले विधायक बने। जबकि 1985 में डीडीहाट विधान सभा सीट से दल के वर्तमान केंद्रीय अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी विधानसभा पहुंचे। 1989 में रानीखेत विधान सभा सीट से जसवंत सिंह बिष्ट और डीडीहाट विधान सभा सीट से काशी सिंह ऐरी दोनों दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। 1983 में काशी सिंह ऐरी डीडीहाट विधानसभा से तीसरी बार विधायक बने।

इसके बाद अलग राज्य की मांग को लेकर दल की ओर से चलाया गया जन आंदोलन तेज हो गया। चाहे दो अक्तूबर 1994 का मामला हो या फिर मसूरी गोलीकांड या फिर रामपुर तिराहा और खटीमा गोलीकांड उत्तराखंड क्रांति दल हर मोर्चे पर राज्य आंदोलन में मजबूती के साथ खड़ा रहा। जब राज्य आंदोलन 1996 में पूरे चरम पर था तो यूकेडी ने ‘राज्य नहीं तो चुनाव नहीं’ का नारा देते हुए चुनाव का बहिष्कार कर दिया। नौ नवंबर 2000 को राज्य का गठन हुआ।

कांग्रेस और भाजपा भी सरकार के गठन में यूकेडी का समर्थन लेती रही। राज्य गठन के बाद प्रदेश में पहली बार वर्ष 2002 में हुए विधान सभा चुनाव में यूकेडी के चार प्रत्याशी विधानसभा पहुंचे। डीडीहाट से काशी सिंह ऐरी, नैनीताल से नारायण सिंह जंतवाल, द्वाराहाट से विपिन त्रिपाठी और यमुनोत्री से प्रीतम सिंह पंवार विधायक बने, लेकिन उत्तराखंड की चाबी कांग्रेस को मिली और एनडी तिवारी मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वर्ष 2007 में द्वाराहाट से पुष्पेश त्रिपाठी, देवप्रयाग से दिवाकर भट्ट और नरेंद्रनगर से ओमगोपाल रावत विधानसभा पहुंचे। उक्रांद ने नौ बिंदुओं पर सशर्त भाजपा को समर्थन दिया। उक्रांद के दिवाकर भट्ट भाजपा सरकार में मंत्री बने। इसके बाद वर्ष 2012 में दल मात्र एक सीट पर सिमटकर रह गया। यमुनोत्री से प्रीतम पंवार विधायक बने और दल ने कांग्रेस को समर्थन दिया। प्रीतम कांग्रेस सरकार में मंत्री बने।

उत्तराखंड क्रांति दल को राज्य आंदोलन के दौरान लोगों का समर्थन जरूर मिला, लेकिन चुनाव में दल को जनादेश नहीं मिला। दल के कुछ लोगों का कहना है कि सत्ता हासिल करना दल का लक्ष्य नहीं था। दल का लक्ष्य था कि हर कीमत पर राज्य का गठन किया जा सके।

एक बार फिर उत्तराखंड में छाई चुनावी फिजा 
आगामी विधान सभा चुनाव के नजदीक आते ही प्रदेश में चुनाव की आबोहवा एक बार फिर लौट आई है। राष्ट्रीय दल हों या फिर क्षेत्रीय दल सबकी ओर से चुनाव की रणनीति बनाई जा रही है। उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी के मुताबिक दल जल, जंगल, जमीन, स्थायी राजधानी, बेरोजगारी, भू-कानून, यूपी से परिसंपत्तियों का बटवारा आदि तमाम मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में उतरेगा।

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