Saturday, March 7, 2026
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अनूठी संस्कृति और परंपरा को समेटे हुए हैं रम्माण, आज भी मौजूद हैं आठवीं सदी के मुखौटे

चमोली जिले के पर्यटन गांव सलूड़-डुंग्रा में प्रतिवर्ष होने वाला रम्माण आज भी प्राचीन लोक परंपरा को समेटे हुए है। रम्माण उत्सव में रामायण की कथा को जागर और मुखौटा नृत्य के माध्यम से आयोजित किया जाता है। लोक संस्कृति और प्राचीन धार्मिक परंपराओं का संरक्षण करने पर रम्माण को वर्ष 2009 में यूनेस्को ने विश्व सांस्कृतिक धरोहर में शामिल किया था।

मान्यता है कि आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए चार मठों की स्थापना की थी। इसके साथ ही शंकराचार्य ने बदरीकाश्रम क्षेत्र में कई धार्मिक आयोजन भी करवाए। इन्हीं धार्मिक आयोजनों में शामिल एक रम्माण का आयोजन आज भी प्राचीन जागर शैली में किया जाता है।

रम्माण शब्द रामायण का अपभ्रंस है। इसमें भोजपत्र के मुखौटे पहनकर ग्रामीण रम्माण (रामायण) का मंचन करते हैं। ढोल की थाप पर 18 तालों में राम की लीलाओं का प्रदर्शन किया जाता है। इस आयोजन में राम के जन्म से लेकर राम-रावण युद्ध और राम के राज्याभिषेक तक के मंचन को नृत्य और जागर के माध्यम से दिखाया जाता है। मुखौटे पहनकर सूर्य भगवान, कालिंका शक्ति, गणेश आदि देवों का आह्वान भी किया जाता है।

सलूड़-डुंग्रा गांव के शिक्षाविद डॉ. कुशल सिंह भंडारी ने रम्माण को विश्वस्तर पर पहचान दिलाई। उन्होंने रम्माण को लिपिबद्ध कर इसे अंग्रेजी में अनुवाद किया, इसके बादगढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय लोक कला निष्पादन केंद्र की सहायता से वर्ष 2008 में रम्माण को दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र तक पहुंचाया गया।

संस्थान ने रम्माण की विशेषता और परंपरा पर शोध के लिए एक टीम को सलूड़-डुंग्रा गांव भेजा गया। यहां आयोजन देखने के बाद रम्माण की 40 सदस्यीय टीम दिल्ली बुलाई गई, जिसने मंच पर ढोल-दमाऊं की थाप पर रम्माण की शानदार प्रस्तुति दी।

इसके बाद रम्माण को भारत सरकार द्वारा यूनेस्को भेजा गया। यूनेस्को ने मेले की पौराणिकता और कला आदि पहलुओं का अध्ययन करने के पश्चात 02 अक्टूबर 2009 को रम्माण को विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया।

सलूड़-डुंग्रा गांव में आयोजित होने वाले प्राचीन रम्माण के मुखौटे आज भी ज्योतिर्मठ के नृसिंह मंदिर के भंडार गृह में मौजूद हैं। रम्माण के जागरों के संरक्षण करने के लिए चमोली जिला प्रशासन की ओर से युवाओं को जागर व ढोल सागर का प्रशिक्षण भी दिया गया। प्रतिवर्ष सलूड़-डुंग्रा गांव में होने वाले रम्माण को करीब से देखने के लिए उत्तराखंड से बाहरी राज्यों के पर्यटक व श्रद्धालु सलूड़-डुंग्रा गांव पहुंचते हैं।

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