Saturday, March 7, 2026
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सिद्धपीठ काली माता मंदिर इंद्रौली में लोगों की विशेष आस्था, नवरात्र में होती है शास्त्रों की पूजा; पूरी होती है मन्नतें

देहरादून। क्षेत्र में सिद्धपीठ काली माता मंदिर की बड़ी मान्यता है। यहां हर वर्ष विशेष अनुष्ठान आयोजित होते हैं। नवरात्र की अष्टमी तिथि को यहां शास्त्रों की पूजा की जाती है। इस दौरान प्रत्येक परिवार के वरिष्ठ दंपती उपवास रखकर ईष्ट देवी के साथ पितरों की भी पूजा करते हैं। अष्टमी तिथि को काली माता की पूजा-अर्चना होती है। बैसाखी से पूर्व काली माता को बुरांश के पुष्प चढ़ाकर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। नवरात्र के अलावा ज्येष्ठ मास के प्रत्येक रविवार को भी काली माता की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है।

मंदिर का इतिहास
देहरादून जिले के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर के इंद्रौली में कुलदेवी के रूप में काली माता की पूजा-अर्चना की जाती है। इंद्रौली स्थित सिद्धपीठ काली माता मंदिर पांडवकालीन बताया जाता है, हालांकि मंदिर की स्थापना के संबंध में स्पष्ट जानकारी किसी के पास नहीं है। मान्यता है कि द्वापर युग में जब बावर क्षेत्र में राक्षसों का आतंक था तो उनके खात्मे के लिए महासू देवता महाशिव का रूप धारण कर क्षेत्र में आए। उनके साथ मां काली भी थीं। काली माता ने क्षेत्र में राक्षसों का संहार किया और तभी से वो यहां विराजमान हैं।

ऐसे पहुंचें मंदिर
जिला मुख्यालय देहरादून से कालसी-चकराता रोड होते हुए इंद्रौली गांव पहुंचा जा सकता है। चकराता से इंद्रौली लगभग 30 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां पर वाया लाखामंडल से भी पहुंचा जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण यहां पर सार्वजनिक यातायात के साधन कम हैं, इसलिए निजी वाहन से यहां आना ज्यादा सुविधाजनक है।

काली माता मंदिर इंद्रौली, चकराता के मुख्य पुजारी पंडित प्रेम दत्त जोशी के अनुसार, ‘ज्येष्ठ मास में जौनसार-बावर, जौनपुर व हिमाचल प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु सिद्धपीठ काली माता मंदिर इंद्रौली पहुंचते हैं। मान्यता है कि काली माता से मांगी गई सभी मन्नत यहां आने पर पूरी होती हैं। नवरात्र की अष्टमी तिथि को परिवार के वरिष्ठ दंपती द्वारा रखे गए व्रत से काली माता प्रसन्न होकर परिवार में सुख शांति व स्मृद्धि लाती हैं।’

काली माता मंदिर इंद्रौली वजीर टीकम सिंह रावत के मुताबिक, ‘सिद्धपीठ में आसपास के क्षेत्र ही नहीं, अपितु देश के विभिन्न स्थानों से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। माता के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं के कष्ट दूर हो जाते हैं। नवरात्र की अष्टमी तिथि व ज्येष्ठ मास के रविवार को सच्चे दिल से माता की आराधना करने पर माता भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण करती हैं।’

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