Tuesday, March 10, 2026
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17 हजार फीट की ऊंचाई पर पिथौरागढ़ की सबसे बड़ी छिपलाकेदार धार्मिक यात्रा शुरू

धारचूला: जिले की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा प्रारंभ हो चुकी है। देव दरबारों में बजने वाले बाजे गाजे के साथ भक्तों का दल 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित छिपलाकेदार को रवाना होने लगे हैं। तहसील बंगापानी के जाराजिबली और तहसील धारचूला के स्यांकुरी गांव से छिपलाकेदार को धार्मिक जात रवाना हो चुकी हैं। बरम से 16 सितंबर को धार्मिक जात रवाना होगी। छिपलाकेदार पर्वतमाला में सोलह हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर छिपला कुंड के पास किशोरों के उपनयन संस्कार होंगे। इस वर्ष बरम, कनार से सात सौ से अधिक लोग छिपलाकेदार यात्रा में जा रहे हैं। 

अति दुर्गम है छिपलाकेदार यात्रा 
प्रति तीसरे वर्ष होने वाली छिपलाकेदार यात्रा अति दुर्गम है। प्रति तीसरे वर्ष भाद्र मास गोरीछाल के जाराजिबली, खड़तोली, शिलिंग और कनार आदि गांवों के लोग तैंतीस कोटि देवताओं के निवास स्थल छिपलाकोट की यात्रा में जाते हैं। इस यात्रा के दौरान आने जाने में लगभग 50 किमी की पैदल यात्रा वह भी नंगे पांव होती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि क्षेत्र के किशोरों का उपनयन संस्कार होता है। तीन पड़ावों के बाद यात्री छिपलाकोट पहुंचते हैं। यात्रा के दौरान भनार नामक स्थान पर स्थित गुफा में एक रात्रि प्रवास करते हैं। इस गुफा के बारे में कहा जाता है कि इस गुफा में जितने भी लोग जाते हैं सभी के लिए जगह मिल जाती है। इस गुफा की रक्षा भेड़ चराने वाले अनवाल करते हैं जिन्हें आदि काल से ही घी और धनराशि दी जाती है। यहां से दूसरे दिन अति दुर्गम चट्टानों पर घास पकड़ कर भक्त छिपलाकेदार पहुंचते हैं । अत्यधिक ऊंचाई में होने के कारण यहां पर ऑक्सीजन की कमी रहती है, परंतु भक्त भारी संख्या में पहुंचते हैं। 
किशोर सफेद वस्त्रों में हाथों में ध्वज लेकर नंगे पांव जाते हैं 
जनेऊ संस्कार के लिए जाने वाले बालक और किशोर सफेद पोशाक, सफेद पगड़ी, हाथोंं मे शंख, लाल और श्वेत रंग का ध्वज और गले में घंटी डालकर नंगे पांव जाते हैं। छिपलाकोट में किशोरों का जनेऊ संस्कार होता है। मुंडन के बाद कुंड में स्नान कर परिक्रमा होती है। अत्याधिक ठंड और बर्फीले तूफान की आशंका को देखते हुए अधिक देर नहीं यहां नहीं ठहरते हैं और सायं तक फिर से भनार गुफा वापस लौट आते हैं। जब जात अपने क्षेत्र में पहुंचती है तो तीर्थ यात्रियों का ग्रामीण पारंपरिक ढंग से ढोल नगाड़ों के साथ स्वागत करते हैं और समस्त तीर्थ यात्रियों को ग्रामीणों की तरफ से भोजन कराया जाता है।

अद्र्धकैलास यात्रा के नाम से जानी जाती है छिपलाकेदार यात्रा 

छिपलाकेदार की यात्रा को अद्र्ध कैलास यात्रा के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार कैलास नहीं जा पाने वाले भक्त अतीत में छिपलाकेदार की यात्रा करते आए हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार छिपलाकेदार यात्रा कैलास यात्रा की तरह ही अति दुर्गम यात्रा है। यहां से प्रसाद के रूप में कुंड का जल और ब्रह्मकमल लाया जाता है जिसे लोगों को बांटा जाता है।
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