वॉशिंगटन/नई दिल्ली, एएनआई: भारत और अमेरिका के बीच हालिया तनाव और टैरिफ जैसे आर्थिक फैसलों की पृष्ठभूमि में एक चौंकाने वाली वजह सामने आई है। अमेरिका के एक शीर्ष शिक्षाविद् प्रोफेसर टेरिल जोंस ने दावा किया है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ इसलिए लगाया क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके नोबेल शांति पुरस्कार के लिए समर्थन नहीं किया।
ट्रंप को चाहिए था नोबेल शांति पुरस्कार का समर्थन
न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में प्रो. टेरिल जोंस ने बताया कि डोनाल्ड ट्रंप खुद को एक वैश्विक नेता और शांति दूत के रूप में स्थापित करना चाहते थे। खासतौर पर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को लेकर ट्रंप ने मध्यस्थता की पेशकश की थी, ताकि वे इस पहल का श्रेय ले सकें।
लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत को पाकिस्तान से बातचीत के लिए अमेरिका या किसी तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं है, तो इससे ट्रंप निराश हुए। जोंस के अनुसार, “ट्रंप चाहते थे कि मोदी उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद ट्रंप ने इस बात को निजी तौर पर ले लिया और भारत पर टैरिफ लगाने जैसा कदम उठाया।”
‘टैरिफ’ है ट्रंप की राजनीतिक भाषा का प्रिय शब्द
प्रोफेसर जोंस ने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर कह चुके हैं कि ‘टैरिफ’ इंग्लिश भाषा का सबसे सुंदर शब्द है। जब वे किसी चीज़ से नाराज़ होते हैं तो प्रतिक्रिया में टैरिफ जैसे आर्थिक हथियार का इस्तेमाल करते हैं। भारत के मामले में भी उन्होंने यही किया।”
ट्रंप की वैश्विक नेता बनने की महत्वाकांक्षा
जोंस ने बताया कि ट्रंप केवल अमेरिका के नेता नहीं, बल्कि दुनिया के प्रभावशाली भू-राजनीतिक नेता बनना चाहते थे। “इसलिए उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम का श्रेय लेने की जल्दबाजी की, लेकिन पीएम मोदी के सख्त रुख ने ट्रंप की रणनीति को असफल कर दिया,”।
भारत को बताया वैश्विक मध्यस्थ
बातचीत के दौरान प्रोफेसर जोंस ने भारत की वैश्विक स्थिति को लेकर भी अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “भारत एक ऐसा देश है जो अमेरिका और रूस दोनों से बात कर सकता है। जब अमेरिका यूक्रेन और रूस के बीच संतुलन नहीं बना पा रहा, तब भारत एक ऐसा देश है जिसकी बात दोनों पक्ष ध्यान से सुन सकते हैं। ऐसे में भारत की मध्यस्थता की भूमिका भविष्य में और भी अहम हो सकती है।”
प्रोफेसर टेरिल जोंस की ये टिप्पणी भारत-अमेरिका संबंधों में हालिया उतार-चढ़ाव को एक व्यक्तिगत राजनीतिक एजेंडा से जोड़ती है। हालांकि, इस पर अमेरिका या भारत की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह बयान भविष्य की विदेश नीति रणनीतियों को समझने में अहम भूमिका निभा सकता है।

