Saturday, March 7, 2026
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म्यांमार में बौद्धों तथा रोहिंग्या संघर्ष दशकों पुराना है; रोहिंग्या अलगाववाद भी इस्लामिक चरमपंथ के विस्तारवाद की एक कड़ी है

भारत में लोग रोहिंग्या की पृष्ठभूमि जाने बिना ही संवैधानिक संरक्षण व संस्कृति की दुहाई दे रहें हैं। उनको भारत में बसाने के आधारहीन तर्क दिए जा रहे हैं। लोग सुनियोजित षड़यंत्र को अंजाम देने में जुटे हैं। तीन तलाक जैसे मुद्दे को मानवाधिकार का विषय न मानने वालों के लिए रोहिंग्याओं को शरण देना मानवाधिकार से जुड़ा दिखाई दे रहा है।

नोएडा (विसंके) :  1950 के दशक में पहली बार रोहिंग्या शब्द राजनीतिक कारणों से प्रचलन में आया। इसके बाद निश्चित अंतराल में ऐसी घटनाएं घटित होती रहीं जिनके कारण बौद्धों व रोहिंग्या के बीच की खाई लगातार बढ़ती चली गई। म्यांमार की यह समस्या दशकों पुरानी है। वर्ष 1948 में म्यांमार को आजादी मिलने से पूर्व ही बौद्धों तथा रोहिंग्या के बीच संघर्ष शुरू हो गया था। यह कहना है  डा. संदीप महापात्रा का। डा. महापात्रा यहाँ प्रेरणा जनंसचार एवं शोध संस्थान में मासिक पत्रिका केशव संवाद के ‘अपना पड़ोस’ विषयक अंक के विमोचन समारोह तथा ‘रोहिंग्या घुसपैठिये: आतंकवाद की नई पौधगाह या शरणार्थी’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी को सम्बोधित कर रहे थे।

रोहिंग्या घुसपैठ का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करते हुए डा. महापात्रा ने कहा कि रोहिंग्या अलगाववाद को सैन्य दमन की प्रतिक्रिया बताने वाले भूल जाते हैं कि म्यांमार की यह समस्या दशकों पुरानी है। वर्ष 1948 में म्यांमार को आजादी मिलने से पूर्व ही बौद्धों तथा रोहिंग्या के बीच संघर्ष शुरू हो गया था। इस वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता कि रोहिंग्या अलगाववाद इस्लामिक चरमपंथ को विश्व भर में फैलाने में सक्रिय रहा है। पाकिस्तान व सऊदी अरब से भी उसे हर प्रकार की मदद मिली। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि भारत में लोग रोहिंग्या की पृष्ठभूमि जाने बिना ही संवैधानिक संरक्षण व संस्कृति की दुहाई दे रहें हैं। उनको भारत में बसाने के आधारहीन तर्क दिए जा रहे हैं। लोग सुनियोजित षड़यंत्र को अंजाम देने में जुटे हैं। तीन तलाक जैसे मुद्दे को मानवाधिकार का विषय न मानने वालों के लिए रोहिंग्याओं को शरण देना मानवाधिकार से जुड़ा दिखाई दे रहा है।

इस प्रकरण में न्यायालय के हस्तक्षेप को उचित ठहराते हुए उन्होंने कहा कि भारत के जम्मू-कश्मीर व मेवात जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में रोहिंग्या की मौजूदगी राष्ट्रीय एकता, अखण्डता व संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय पक्ष के ऊपर कभी भी मानवाधिकार को वरीयता नहीं दी सकती। कार्यक्रम में अपने अध्यक्षीय संबोधन में श्री एन. पी. सिंह (अध्यक्ष, नोएडा संयुक्त रेजिडेंट वेलफेयर एसोशिएशन) ने आवहान किया कि रोहिंग्या घुसपैठ जैसे मामलों में हमें सरकारों पर निर्भर न रह कर आत्मनिर्भर होना होगा। हमारी जागरूकता व सक्रियता ही राष्ट्रीय सुरक्षा को अक्षुण्य बनाए रख सकती है। आर्शीवचन देते हुए डा. भीम सिंह जी (पूर्व कृषि वैज्ञानिक) ने कहा कि देश के सभी नागरिकों की पर्याप्त सजगता से ही ऐसे खतरों व चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। आयोजन में डा. प्रदीप कुमार (असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने केशव संवाद पत्रिका का परिचय प्रस्तुत किया। उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड के संयुक्त क्षेत्र प्रचार प्रमुख मा. कृपाशंकर जी ने संस्थान का परिचय दिया। मंच परिचय पत्रिका की संपादक मण्डल की सदस्या श्रीमती नीता सिंह ने कराया।

कार्यक्रम का समापन निदेशक डा. वन्दना पांडेय के आभार ज्ञापन के साथ हुआ। संचालन बुद्धिजीवी गोष्ठी संयोजक डा. अखिलेश मिश्र (एसोसिएट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, एस.डी. पी.जी कालेज, गाजियाबाद) ने किया। इस अवसर पर श्री रवि श्रीवास्तव, श्री रमन चावला, श्री अणंज त्यागी, डा. रीना सिंह, डा. नीलम पंवार, डा. मिथिलेश, डा. उदिता त्यागी, मनोज पुंडीर, श्रीमती प्रतिभा सिंह समेत अनेक गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे।

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