Saturday, March 7, 2026
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आर्य भारत के ही मूल निवासी थे – राखीगढ़ी में मिले कंकालों के डीएनए जांच का निष्कर्ष, इतिहास का रोमिला थापर के आर्य भारतीय नहीं थे थ्योरी प्रशनों के घेरे में

अब तक हम इतिहास की पुस्तकों में रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों द्वारा गढ़ी थ्योरी, ‘आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थे’ पढ़ते आए हैं कि भारत में आर्य लोग बाहर से आकर बसे थे. मगर यह सत्य नहीं है. आर्य भारत के ही स्थाई निवासी थे. हिसार के नारनौंद क्षेत्र के राखीगढ़ी गांव में मिले मानव कंकालों की डीएनए रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है.शुक्रवार को दिल्ली स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर हैरिटेज में डेक्कन यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर वसंत शिंदे और डॉ नीरज राय ने प्रेस वार्ता कर शोध के निष्कर्षों के संबंध में जानकारी दी. प्रेस वार्ता में राखीगढ़ी में मिले 5000 वर्ष पुराने मानव कंकालों की डीएनए रिपोर्ट सार्वजनिक की गई.उन्होंने बताया कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे. संपूर्ण दक्षिण एशिया वासियों के पूर्वज एक ही थे. वैज्ञानिकों ने देश के अलग-अलग हिस्सों से करीब 2500 लोगों के ब्लड सैंपल लेकर उनका डीएनए और राखीगढ़ी में मिले मानव कंकाल के डीएनए का मिलान किया तो पाया कि आज भी उनका और हमारा डीएनए मेल खाता है.गांव राखीगढ़ी में अप्रैल 2015 में टीले नंबर-7 पर हुई खोदाई के दौरान दर्जनों मानव कंकाल मिले थे. इन कंकालों का डीएनए जांच भारत के हैदराबाद और अमेरिका में किया गया. चार साल के अध्ययन के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यह लोग आर्यन हैं और बाहर से नहीं आए, बल्कि उन्होंने यहीं पर ही रहकर गांव से शहर तक का विकास किया. शुरुआती दौर में उन लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती-बाड़ी और पशुपालन था.बाद में उन्होंने कुछ देशों से व्यापारिक संबंध भी बनाए. अगर ये लोग बाहर से आए होते तो उनकी संस्कृति अलग होती. वामपंथी इतिहासकारों ने अभी तक पढ़ाया था कि आर्य बाहर से आकर बसे थे. लेकिन, अब प्रमाण मिल चुका है कि आर्य ही यहां के मूल निवासी थे. शुरुआती दौर में उन लोगों ने एक गांव को बसाया और फिर धीरे-धीरे उन्होंने शहर के रूप में राखीगढ़ी को मेगा सिटी के रूप में विकसित किया. जिस तरह उन्होंने इस शहर को बसाया था, उसकी पूरी योजना तैयार की थी.डीएनए में यह भी सामने आया है कि उस समय के लोग खाने में गेहूं, चना और सरसों का प्रयोग करते थे और कुछ लोग जानवरों का शिकार करके उन्हें भी खाने के रूप में प्रयोग करते थे.डेक्कन यूनिवर्सिटी पुणे के वीसी प्रोफेसर वसंत शिंदे का कहना है कि हमारे इतिहास में जो गलत पार्ट लिखा गया है, हम उसे सही तथ्य सामने लाकर सुधारने का काम करेंगे और आगे भी हड़प्पा संस्कृति पर हमारी रिसर्च जारी रहेगी. इस संस्कृति से अभी और भी राज सामने आएंगे जो इतिहास के मायने बदल देंगे.

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