Saturday, March 7, 2026
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बस्तर के विष पुरुष सुंदर: सांप का जहर मुंह से खींच देते हैं नई जिंदगी  

जगदलपुर (छत्तीसगढ़) : सांप का नाम सुनते ही जहां लोगों को सांप सूंघ जाता है, वहीं बस्तर के चोकावाड़ा के वैद्यराज सुंदर सेना मुंह से सांप का जहर खींचकर पिछले 15 साल में 167 लोगों को नहीं जिंदगी दे चुके हैं। ऐसा करते समय वे न तो स्वयं कोई जड़ी-बूटी खाते हैं, न ही सर्पदंश पीड़ित को ही कोई दवा खिलाते हैं। इसीलिए विष पुरुष के रूप में उनकी पूरे बस्तर में पहचान है। सबसे खास बात, वे निःशुल्क इलाज करते हैं।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्य की सीमा पर स्थित ग्राम धनपुंजी में वन विभाग द्वारा स्थापित वन औषधालय में सुंदर सेना वर्ष 2002 से वैद्यराज के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें 3000 हजार रुपए मानदेय मिलता है। बस्तर के वनौषधियों की उन्हें अच्छी जानकारी है। यह हुनर उन्हें अपने गुरु मानसाय से मिला था। सर्दी-खांसी से लेकर कुष्ठ जैसी बीमारियों का इलाज वे वनौषधियों से करते हैं।
वनौषधि से बने विष पुरुष
सुंदर बताते हैं कि जब वे 15-20 साल के थे, तब से गुरु के आदेश पर कुछ ऐसी कड़वी वनौषधियों का नियमित सेवन करते रहे हैं जिसके चलते अब उन पर किसी भी सर्प के विष का असर नहीं होता। वे पिछले 25 साल से सर्पदंश पीड़ितों को नई जिंदगी दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि सर्पदंश में सबसे पहले डसे गए अंग के ठीक ऊपरी हिस्से को कसकर बांध दें। फिर पीड़ित को इलाज के लिए कहीं भी ले जाएं।
मुंह से चूसते हैं जहर
सुंदर बताते हैं कि सबसे पहले सर्प द्वारा डसे गए स्थान को गर्म पानी से धोते हैं, फिर लगातार मुंह से जहर चूसकर बाहर थूकते जाते हैं। इसके बाद वे मरीज को सिर्फ आराम करने की सलाह देते हैं। किसी प्रकार की दवा नहीं देते। इस सेवा के बदले में वे कोई शुल्क भी नहीं लेते। उन्होंने बताया कि उनके पास अन्य प्रांतों से भी पीड़ितों को लाया जाता है।
अब तक सांप के काटे 167 लोगों का जहर निकाला बाहर
सुंदर ने बताया कि वर्ष 2002 से 15 नवंबर 2017 तक वे 167 सर्पदंश पीड़ितों के शरीर से जहर निकाल चुके हैं। ऐसे पीड़ितों के नाम वन औषधालय के रजिस्टर में बाकायदा दर्ज भी हैं। उनके लिए यह संतोषजनक बात है कि उनके पास लाए गए किसी भी सर्पदंश पीड़ित की मौत जहर के कारण नहीं हुई। सांप का जहर चूसने के कारण ही लोग उन्हें बिस मनुक (विष पुरुष) कहने लगे हैं। उन्होंने बताया कि कई बार बेहोशी के कारण परिजन पीड़ित को नहीं ला पाते, ऐसे में लोग उन्हें पीड़ित तक ले जाते हैं।
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