Saturday, March 7, 2026
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देशभर में मशहूर है कुमाऊं की खड़ी और बैठकी होली, रंगों के साथ रागों की होली

देश में होली के रंगों की धूम मची हुई है। हर एक शख्स रंगों के इस त्योहार का बड़ी बेसब्री से इंतजार करता है। यहां हर जगह होली अलग.अलग तरीके से मनाई जाती है। कहीं लठमार होली होती है तो कहीं फूलों की होली खेली जाती है। उत्तराखंड की खड़ी और बैठकी होली देशभर में मशहूर है।

देश मे ब्रज के बाद सबसे ज्यादा होली उत्तराखंड की प्रसिद्ध मानी जाती है। बैठकी होली यानि जो होली बैठ कर गायी जाती है और खड़ी होली जोकि खड़े होकर सामूहिक नृत्य के साथ चौराहे चौबारों में गायी जाती है।

खड़ी होली ग्रामीण अंचल की ठेठ सामुहिक अभिव्यक्ति है जबकि बैठकी होली को नागर होली भी कहा जाता है। बैठकी होली शास्त्रीय संगीत की बैठकों की तरह होते हुए भी लोकमानस से इस प्रकार जुड़ी हैं कि उस महफिल में बैठा हुआ प्रत्येक व्यक्ति उसमें अपने को गायक मानता ह और श्रोता के बीच कोई दूरी नहीं होती है। विभिन्न रागों से सजी होली बैठकी की इस परम्परा में अनगिनत गीत हैं जिन्हें श्रुतियों से पीढ़ी दर पीढ़ी गाया जा रहा है।

देशभर में मशहूर है कुमाऊं की खड़ी और बैठकी होली
देश के कई स्थानों की होली ना केवल विशेष महत्व रखती है बल्कि ये निराले अंदाज में भी मनाई जाती है। ऐसी ही विशेष होली देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में मनाई जाती है। जहां होली सिर्फ रंगों से नहीं बल्कि रागों से भी खेली जाती है। कुमाऊं की होली का समृद्ध इतिहास 400 सालों से भी ज्यादा पुराना है।

कुमाऊंनी होली का नाम सुनते ही आप के कानों में ढोल की थाप के साथ कदमों की चहल कदमी और जल कैसे भरूं जमुना गहरी का गीत गुंजने लगा होगा। होली के समय पहाड़ों की छटा ही निराली होती है और यहां का नजारा कुछ ऐसा होता है की हर किसी को मंत्र मुग्ध कर दे।

एक महीने तक कुमाऊं में मनाई जाती है होली
आपको बता दें कुमाऊं में होली एक महीने तक मनाई जाती है। कुमाऊं भर में होली की शुरूआत शिवरात्रि के बाद चीर बंधन से हो जाती है जो कि छलड़ी तक चलती है। कुमाऊं क्षेत्र में होली की लोकप्रियता को बढ़ाने का श्रेय चंद वंश को जाता है। चंद वंश के नक्शे कदमों पर चलते हुए पहाड़ों ने आज भी अपनी खड़ीए बैठकी और महिला होली की परंपरा को सहेजी हुई है।

चीर बंधन से होती है होली की शुरूआत
चीर बंधन के बाद कुमाऊं के हर घर में आए दिन होली के गीत गाए जाते हैं। जिसकी शुरूआत गांव के मंदिर से होती है।

कुमाऊं में बैठकी होली पौष माह के पहले रविवार से ही शुरू हो जाती है। बैठकी होली को कुमाऊंनी होली का सबसे लोकप्रिय रूप माना जाता है। इसमें रात को संगीत सभाएं लगती हैं और स्वांग के बिना तो ये होली अधूरी मानी जाती है।

कुमाऊं में एकादशी की शुरूआत से गांवों में ढोल झांझर और कदमों की खास ताल से खड़ी होली का गायन शुरू हो जाता है। चीर बंधन के साथ शिव स्तुति से खड़ी होली का गायन शुरू होता है। ढोल नगाड़ों की थाप पर धुन लल और ताल के साथ नृत्य करते लोग ही इस होली का मुख्य आकर्षण होते हैं।

महिला होली भी होती है बेहद खास
बैठकी होली की तरह ही यहां महिला होली भी मनाई जाती है। जहां महिलाओं की बैठकें लगती हैं। जिसमें गीत.संगीत सिर्फ महिलाओं पर ही आधारित होते हैं। राग.दादरा और राग कहरवा में गाए जाने वाले कुमाऊंनी होली में राधा कृष्ण राजा हरिशचन्द्र श्रवण कुमार सहित रामायण और महाभारत काल की गाथाओं का वर्णन भी किया जाता है।

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