Saturday, March 7, 2026
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उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुजफ्फरनगर आकर उत्तराखंड के शहीदों को उनकी याद में बने स्मारक पर श्रद्धांजलि दी।

मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर पुलिस की बर्बरता का शिकार हुए लोगों की पुण्यतिथि पर उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत बर्बरता में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए हेलीकॉप्टर से मुजफ्फरनगर पहुंचे। उन्होंने रामपुर तिराहे पर बने स्मारक पर शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करने के बाद श्रद्धांजलि समारोह को सम्बोधित किया। सीएम ने ईनाडु इंडिया से बातचीत में कहा कि आंदोलनकारियों को इंसाफ ना मिलने की सबसे बड़ी वजह हैं कि उनसे जुड़े सबूतों को नष्ट करने का काम उस समय किया गया। वो कौन लोग थे वो उनका नाम नहीं लेना चाहते। पीड़ितों इंसाफ मिलने के सवाल पर उन्होंने कहा कि हम आश्वस्त हैं।
2 अक्टूबर, 1994 को उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली के राजघाट पर प्रदर्शन करने जा रहे लोगों को पुलिस ने रामपुर तिराहे पर रोक लिया था और उन पर फायरिंग कर दी थी। पुलिस की इस बर्बर और दमनकारी कार्रवाई में आधा दर्जन लोग मारे गये थे और करीब डेढ़ दर्जन लोग घायल हुए थे। इतना ही नहीं रात के अंधेरे में उस कार्रवाई में शामिल कुछ सिपाहियों ने कथित तौर पर कुछ महिला प्रदर्शनकारियों की इज्जत आबरू भी लूटी थी।
पुलिस द्वारा की दमनकारी कार्रवाई उस वक्त अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां में बनी हुई थी और केन्द्र सरकार ने सीबीआई को पूरे प्रकरण की जांच सौंपी थी। जांच पड़ताल के बाद सीबीआई ने मुजफ्फरनगर की पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ एक दर्जन से अधिक मामले दर्ज किए गए थे।
आज 23 वर्ष पूरे हो गये लेकिन पीड़ितों को न्याय नहीं मिला। हालांकि उत्तराखंड राज्य का गठन हो गया लेकिन रामपुर तिराहा कांड के आरोपियों को कानून तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सका। जिन्होंने बर्बरतापूर्वक आंदोलनकारियों का दमन किया था।
27 पुलिस वालों पर बलात्कार का आरोप
वर्तमान में मुजफ्फरनगर की विशेष अदालत में छह मामले लंबित है। इनमें 27 पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ बलात्कार, लूट, अपराधी षड्यंत्र रचने और आंदोलनकारियों के विरुद्ध फर्जी मामले दर्ज करने के मामले शामिल है। इनमें महिलाओं के साथ दुराचार समेत दो मामलों में सुनवाई पर आरोपियों ने हाईकोर्ट से स्थगन आदेश ले रखा था। लचर पैरोकारी के चलते यह काफी समय तक स्थगन आदेश रद नहीं कराया जा सका है। इसका सीधा फायदा आरोपियों को मिला।
कोर्ट में मामले चलते चलते मर चुके पीड़ित, गवाह और आरोपी
वहीं, बाकी मामलों में सीबीआई की ओर से सही प्रकार से पैरोकारी नहीं हो पा रही। उधर, न्याय की आस में कई लोगों की मृत्यु भी हो चुकी है। मरने वालों में पीड़ित परिवार, गवाह और आरोपी शामिल हैं। मृतकों में फर्जी मामले दर्ज करने के आरोपी तत्कालीन कोतवाल मुजफ्फरनगर मोती सिंह, पुरकाजी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के डॉ प्रीतम सिंह और सिपाही कमल सिंह आदि का देहांत हो चुका है
उत्तराखंड सरकार ने पीड़ितों को जल्द त्वरित न्याय दिलाने के लिए समय-समय पर कई सरकारी वकीलों की नियुक्ति की लेकिन यह प्रयास सफल नहीं रहे। वो इललिए कि सीबीआई के पक्षकार होने की वजह से उत्तराखंड के वकील सीधे तौर पर अदालत मेंपक्ष की पैरवी नहीं कर पा रहे। मुजफ्फरनगर में सीबीआई की स्थायी अदालत न होने की वजह से सीबीआई के वकीलों को मामले की पैरवी करने के लिए हर तारीख पर दिल्ली, गाजियाबाद और देहरादून से आकर यहां पैरोकारी करनी पड़ती है।
यही कारण है कि उत्तराखंडियों के पृथक राज्य का सपना तो पूरा हो गया परंतु तत्कालीन प्रदेश सरकार खासकर पुलिस की ओर से जो जख्म मिले वो अब तक ताजा हैं।
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