Sunday, March 8, 2026
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भारत के पत्रकारों को पुलित्ज़र : भारतीय सैनिकों को अत्याचारी साबित करने का पुरस्कार ! -सौरभ सिंह

इस साल जब पुलित्ज़र पुरस्कारों की घोषणा की गयी तो तीन नामों ने भारतीयों का ध्यान सबसे ज्यादा खींचा. चन्नी आनंद, मुख्तार खान और डार यासीन को फीचर फोटोग्राफी के लिए पुलित्ज़र पुरस्कार दिया गया. परिचय में ही लिखा गया कि “कश्मीर के विवादित क्षेत्र में”. जबकि “कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है”, भारत के बार-बार यह स्पष्ट करने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय लिबरल गैंग भारत की छवि को दुनिया में धूमिल करने का दुष्कृत्य कर रहे हैं.

कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी और जिहादियों का गठजोड़ कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के बाद से लगातार सक्रिय है. कारण, इनका रोजगार टकरावों से ही चलता है. कश्मीर में स्थापित होती शांति और दशकों के विवाद का शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाना, इनसे सहन नहीं हो रहा है. यह अब नीचता के हद तक गिर चुके हैं और आतंकी भावनाओं को भड़काने के उद्देश्य से, विश्व में भारत की छवि ख़राब करने और भारतीय सैनिकों को अत्याचारी साबित करने के लिए यह पुरस्कार दिए गए हैं.

पुरस्कारों में नाम सबसे पहले चन्नी आनंद का है, मगर चयनित तस्वीरों में मात्र एक तस्वीर उनकी है. यह एकमात्र ऐसी तस्वीर है जो भारत के खिलाफ जहर नहीं उगलती, लेकिन यह संस्था का बस बैलेंसिंग एक्ट है.

जिस डार यासीन का नाम सबसे आखिर में लिखा है, उसकी सबसे ज्यादा तस्वीरें इस पुरस्कार में शामिल की गयी हैं. कहते हैं एक तस्वीर 100 शब्दों के बराबर होती है, लेकिन एक फ्रेम की तस्वीर असलियत नहीं बताती. तो आइये समझते हैं किस तरह इन तस्वीरों के माध्यम से झूठा प्रोपगेंडा फैलाकर भारत को बदनाम करने के प्रयास किया जा रहे हैं.

इस तस्वीर में दिख रहा “WE DREAM OF An INDEPENDENT KASHMIR” ही सिद्ध कर देता है कि तस्वीर खींचने वाले का मकसद क्या है, वह कैसे विचारों को बढ़ावा देना चाहता है. लेकिन अगर थोड़ी और गहराई में जाएंगे तो आपको यह षड्यंत्र और बेहतर तरीके से समझ में आएगा. यह प्रदर्शन 23 अगस्त, 2019 का है, इसी दिन भारतीय खुफिया एजेंसी ने यह रिपोर्ट दी थी कि पाकिस्तान अफगानी और पश्तून लड़ाकों को कश्मीर में लड़ने के लिए रिक्रूट कर रही है.

एक तरफ पाकिस्तानी आतंकियों को देश के अन्दर भेज रहे थे और उसी समय देश के दुश्मन फ्री कश्मीर का बोर्ड लेकर सेना का ध्यान दूसरी तरफ भटकाने में लगे थे. डार यासीन इस तस्वीर से आजादी की मांग करने वालों को हीरो बनाना चाहता है, भारत में अलगाववादी भावनाओं को भड़काना चाहता है.

22 मार्च की घटना की ख़बरों को देखें तो पता चलेगा कि आतिफ दो और लोगों के साथ उस बिल्डिंग में था, जिसमें आतंकी छिपे हुए थे. सेना को जब सूचना मिली कि यहाँ आतंकी छिपे हैं तो ऑपरेशन शुरू हुआ. दो और लोग जो उस बिल्डिंग में छिपे थे, उन्हें बचा लिया गया, लेकिन आतिफ उस घटना में मारा गया. स्क्रॉल की रिपोर्ट बताती है कि वह आतंकी आतिफ की बहन से शादी करना चाहते थे, लेकिन उसके परिवार ने मना कर दिया और इसी से खार खाए आतंकी ने आतिफ के परिवार को बंदी बना लिया था.

जब सेना के जवानों ने उस बिल्डिंग को चारों तरफ से घेर लिया तो आतंकी ने आतिफ की नृशंस हत्या कर दी. एक 11 साल का बच्चा पहले देश के दुश्मनों की गोली का शिकार बना और अब शिकार बन रहा है देश के दुश्मनों के दुष्प्रचार का. आतिफ अगर आज जिन्दा होता तो शायद चीख चीख कर इस घटना की सच्चाई बताता, लेकिन अफ़सोस लाशें कुछ बोलती नहीं. आतिफ की कब्र पर भारत विरोधी जहर की यह खेती क्या पुरस्कार के लायक है? ये आधी सच्चाई क्या पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित कहे जाने वाले पुरस्कार की हकदार है?

8 अगस्त की इस तस्वीर को देखिये, जो कोई भी एक नज़र देखेगा, यही सोचेगा कि कितना अत्याचार किया जा रहा है कश्मीरी लोगों पर. रास्ते पर रोक रोककर प्रताड़ित किया जा रहा है. लेकिन यह भी आधी अधूरी सच्चाई है. इस दिन बीबीसी में प्रकाशित इस रिपोर्ट को पढ़िए –

रिपोर्ट कहती है कि लोगों में बहुत ज्यादा गुस्सा है. वहां के स्थानीय ड्राईवर कह रहे हैं कि लोगों के अन्दर ज्वालामुखी उबल रहा है, कभी भी फट सकता है. यह ज्वालामुखी, यह गुस्सा, यह नफरत कश्मीरियों के अन्दर किसने भरा है, किन दुष्प्रचारों से भरा है? यह भी चर्चा का विषय है, लेकिन बाद में. अभी यह सोचकर देखिये कि जब स्थितियां इतनी विस्फ़ोटक हो रहीं हों, तब क्या सेना के जवान का इस तरह से जांच किया जाना कुछ गलत है?

स्वतंत्रता हर नागरिक का मूल अधिकार है, भारत का हर नागरिक भयमुक्त वातावरण में रहे यह हर भारतवासी चाहता है, सरकारें चाहती हैं. लेकिन चंद मुट्ठी भर लोग जिनका रोजगार कश्मीर में आतंक और नफरत फैलाकर चलता है, उन्होंने इसे अशांत क्षेत्र में बदल दिया है और ऐसे ही लोगों को बौद्धिक समर्थन देने का काम, अंतरराष्ट्रीय इको सिस्टम देने का काम डार यासीन जैसे लोग कर रहे हैं.

इस तस्वीर में आपको महिलाएं बेचारी दिख रही होंगी, हाथ देखकर लग रहा है शायद लाठी से बचने की कोशिश में लगी हैं. एकबारगी यह देखकर आपको भी बुरा लगा होगा, अफ़सोस हुआ होगा. लेकिन एक सेकंड रुकिए, जिस दिन यह तस्वीर खिंची गयी थी, उसी दिन डार यासीन की खींची एक और तस्वीर के साथ वाशिंगटन पोस्ट में एक रिपोर्ट छपी थी.

इस रिपोर्ट की तस्वीर में आपको बेचारगी नहीं दिखेगी गुस्सा दिखेगा. यही तरीका है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना एजेंडा सेट करने का – जब यह रिपोर्ट छपी तब दुनिया को यह दिखाना था कि मोदी के इस फैसले से कश्मीरियों में गुस्सा है, महिलाएं भी रास्तों में उतरकर अपना रोष प्रकट कर रही हैं. उस समय के प्रोपगेंडा के लिए गुस्से वाली तस्वीर सूटेबल थी, मगर काम नहीं कर पाई तो अब तरीका बदला जा रहा है, अब गुस्से में नहीं बल्कि पीड़ित दिखाया जा रहा है, शोषित दिखाया जा रहा है. आप अगर किसी भी प्रोपगेंडा को देखेंगे तो यह एक सामान्य सा नियम है, सामान्य सा पैटर्न है।

इस तस्वीर में सेना की बुरी तरह से क्षतिग्रस्त गाड़ी के ऊपर एक पत्थरबाज़ हमला करता हुआ दिखाई दे रहा है. कैप्शन में लिखा है “कश्मीरी आन्दोलनकारी भारतीय सेना के वाहन पर पत्थर से हमला करता हुआ”. काश की आतंकवादी को आन्दोलनकारी कहने वाले डार यासीन उस स्टेरिंग व्हील के पीछे बैठे उस सैनिक का भी चेहरा दिखा पाते, जो घर को, परिवार को छोड़कर देश की सेवा में लगा है. उसके हाथों में बन्दूक है, मगर वह उसको चला नहीं सकता – सामने से आता पत्थर उसकी जान भी ले लेगा तो वो किसी बहस का हिस्सा नहीं बनेगा, वह मारा भी गया तो कोई मानवाधिकार आयोग उसके अधिकारों की बात नहीं करेगा. वो देश की सेवा करते हुए चुपचाप अपनी चिता में चला जाएगा, और ये बुद्धिजीवी आतंकियों को हीरो बनाते रहेंगे.

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