Sunday, March 8, 2026
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न्यूनतम आय गारंटी योजना गरीबों को गुमराह करने का षड़यंत्र-ललित गर्ग

सवाल है कि इस योजना के लिए संसाधन कहां से लाए जाएंगे? क्या इस तरह की तथाकथित गरीबों को गुमराह करने एवं ठगने वाली घोषणाओं से गरीबी या गरीबों का कोई वास्ता है? क्या इस तरह की घोषणाओं से गरीबी दूर हो सकती है?

सत्तर साल से गरीबी एवं गरीबों को मजबूत करने वाली पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने दुनिया की सबसे बड़ी न्यूनतम आय गारंटी योजना से गरीबों के हित की बात करके देश की गरीबी का भद्दा मजाक उडाया है। इस चुनावी घोषणा एवं आश्वासन का चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ेगा, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इस घोषणा ने आर्थिक विशेषज्ञों एवं नीति आयोग की नींद उड़ा दी है। इस योजना को बीजेपी सरकार द्वारा किसानों को सालाना 6000 रुपए देने की घोषणा का जवाब माना जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अनुसार, अगर उनकी सरकार सत्ता में आई तो सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों को हर साल 72,000 रुपए दिए जाएंगे। इस सहायता राशि को सीधे गरीबों के खातों में हस्तांतरित किया जाएगा और 5 करोड़ परिवार अथवा करीब 25 करोड़ लोग इससे लाभान्वित होंगे।

इस घोषणा पर अर्थशास्त्री भी मंथन करने में जुट गए हैं। सबके सामने यही सवाल है कि इस योजना के लिए संसाधन कहां से लाए जाएंगे? क्या इस तरह की तथाकथित गरीबों को गुमराह करने एवं ठगने वाली घोषणाओं से गरीबी या गरीबों का कोई वास्ता है? क्या इस तरह की घोषणाओं से गरीबी दूर हो सकती है?

आजादी के सत्तर सालों में हर दौर में महंगाई से आम जनता त्रस्त रहा है। मगर सरकारों ने पूंजीपतियों के गलत कदमों को कड़ाई से रोकने के लिए कदम नहीं उठाये। बल्कि पूंजीपतियों के प्रति अपना सौहार्द्र और प्रेम ही अब तक चुनी सरकारों ने व्यक्त किया है। मतलब यह कि वोट किसी का और सरकार किसी की। सरकार कोई भी हो उसे अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का हुनर पूंजीपतियों और अमीरों को खूब आता है। जब स्वाधीन भारत की सरकारें देश की अधिसंख्य गरीब जनता की दुर्दशा को नजर अंदाज कर पूंजीपतियों के प्रति वफादारी में लगी रहती है तो आम जनता की आजादी के मायने बदल जाते हैं। असहाय जनता निराश और कुंठा के भाव के साथ पराधीन राष्ट्र के नागरिक की तरह दुर्घटनाग्रस्त जीवन जीने को अभिशप्त होती है।

वस्तुतः भारत में अमीर वर्ग ही असली स्वाधीन है और लगभग सारा तंत्र, सारी व्यवस्था उसकी मुट्ठी में है। स्वाधीन देश के नागरिक को जो अधिकार प्राप्त होने चाहिए वे सिद्धांत में तो हैं, मगर व्यवहार में नहीं हैं। ये समस्त अधिकार सिर्फ संपन्न वर्ग की पहुंच में हैं। बल्कि कहना चाहिए कि अघोषित रूप से उन्हीं के लिए आरक्षित हैं। संसाधनों, सुविधाओं और अधिकारों के वितरण में भयानक असमानता है। इस कदर असमानता है कि आम जनता की स्थिति परतंत्र राष्ट्र के नागरिक जैसी है। धनवान लोग आजाद देश के आजाद नागरिकों की तरह विलासिता के साथ जीते हैं। पिछले कुछ वर्षों से गरीबों का हक छीनने का एक नया हथियार बड़े जोर−शोर से इस्तेमाल हो रहा है। वह है विकास का हथियार। विकास के नाम पर गरीबों की अपनी पैतृक जीवन−गांवों से उजाड़ना, तबाह करना और आत्महत्या के कगार पर पहुंचा देना सभी सरकारों का पुण्य कर्तव्य है। इस तथाकथित विकास के पक्ष में बोलना राष्ट्रभक्ति है, जबकि इसके विपक्ष में बोलना राष्ट्रद्रोह है। इस विकास की भांग कुछ ऐसी कुएं में घुली है कि सरकारों और उच्च वर्ग के साथ−साथ न्यायपालिका और मीडिया तक बहुत हद तक नशे में डूबे दिखाई देते हैं।

दुर्भाग्य है कि विकास का बुलडोजर गरीबों पर ही चलता है। कोठियों और अट्टालिकाओं में बैठे लोगों के लिए यह मलाई कमाने का अवसर होता है। वे उजड़ते तो जानते कि विकास जीवन में क्या−क्या लील जाता है? बड़े−बड़े बांध, चौड़ी−चौड़ी सड़कें, तमाम प्रदूषण कर तबाही मचाने वाले कारखाने और भी जाने क्या−क्या लोगों को उजाड़ कर बनाए जा रहे हैं। निश्चित रूप से यह गरीब उजड़ने वाली जनता स्वाधीन नहीं है।

आदिवासी अपनी विरासत के जल, जंगल−जमीन से उजाड़े जा रहे हैं। किसानों का उजड़ना, बर्बाद होना इतना अधिक है कि वे आत्महत्या तक को विवश हो रहे हैं। मजदूर नारकीय जीवन जी रहे हैं। उन्हें किसी तरह की सुरक्षा, सुविधा या अधिकार प्राप्त नहीं है। ये किसान, मजदूर और आदिवासी देश के निर्धनतम लोग हैं। किसी भी कर्म के उचित या अनुचित होने को ज्ञात करने के लिए गांधीजी ने एक मंत्र दिया था कि सोचो कि हमारे कर्म से समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति को लाभ होगा या नहीं? गांधी को आधार बनाकर सत्ता तक पहुंचे लोग ही गांधी के सिद्धान्तों की धज्जियां उड़ाते हैं। समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान करने वाले कितने काम सरकारें, पूंजीपति, समृद्ध लोग या प्रभुत्व सम्पन्नवर्ग कर रहा है यह जगजाहिर है। जब देश की आबादी का बड़ा हिस्सा अभावग्रस्त, अधिकारविहीन और नारकीय जीवन जी रहा हो तो भारत की स्वाधीनता कितनी सच्ची है, यह स्पष्ट हो जाता है।

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