Sunday, March 8, 2026
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48 घंटे अस्पताल में रुकने पर प्रसूता को मिलेंगे दो हजार रुपये, उत्तराखंड सरकार ने की इस पहल की शुरुआत

देहरादून। किसी भी प्रदेश की तरक्की का ग्राफ वहां स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर निर्भर करता है। महिलाओं को पहाड़ की रीढ़ कहा गया है। ऐसे में महिला स्वास्थ्य का महत्व और भी बढ़ जाता है। सुरक्षित प्रसव राज्य में एक बड़ी चुनौती रहा है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने राज्य स्थापना दिवस पर एक और पहल की है, जिसका मकसद मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी व संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना है।

राज्य में ईजा-बोई शगुन योजना की शुरुआत की जा रही है। राज्य स्थापना दिवस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसकी घोषणा भी कर दी है। जिसके तहत जच्चा-बच्चा के सुरक्षित स्वास्थ्य के लिए अस्पताल में 48 घंटे रुकने वाली प्रसूता को दो हजार रुपये की उपहार राशि दी जाएगी। यह जननी सुरक्षा योजना के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि से अलग होगी। जननी सुरक्षा योजना के तहत संस्थागत प्रसव कराने वाली शहरी महिलाओं को 1000 व ग्रामीण महिलाओं को 1400 रुपये बतौर प्रोत्साहन राशि प्रदान करने का प्रविधान किया गया है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक डा. सरोज नैथानी ने बताया कि प्रसव के बाद के 48 घंटे जच्चा-बच्चा के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इस अवधि में न केवल बच्चे, बल्कि जच्चा को भी संक्रमण का खतरा होता है। वहीं, किसी प्रकार की समस्या होने पर जान का खतरा भी बढ़ जाता है। नवजात शिशुओं की करीब 40 प्रतिशत मृत्यु प्रसव के दौरान या प्रसव के बाद 24 घंटे के अंदर होती है। ऐसे में जरूरी है कि जच्चा-बच्चा चिकित्सकों की निगरानी में रहें। उन्होंने बताया कि राज्य में संस्थागत प्रसव का आंकड़ा अभी तकरीबन 80 फीसद है। जिसमें सरकारी व निजी अस्पताल दोनों ही शामिल हैं। यह प्रयास किया जा रहा है कि शत-प्रतिशत प्रसव अस्पताल में ही हों, जिससे जच्चा-बच्चा, दोनों सुरक्षित रहें।

किशोरियों की निश्शुल्क हीमोग्लोबीन जांच

राज्य में अब 11 से 18 आयु वर्ग की किशोरियों की निश्शुल्क हीमोग्लोबीन जांच और 104 हेल्पलाइन के माध्यम से निश्शुल्क चिकित्सीय परामर्श मिलेगा। राज्य में एनीमिया एक बड़ी चुनौती रहा है। 15-19 आयु वर्ग में 42.4 प्रतिशत किशोरियां एनीमिया से पीड़ित पाई गई हैं। ऐसे में एनीमिया के स्तर को कम करने और पोषण पर विशेष ध्यान देना अनिवार्य हो गया है, जिसके लिए जांच, उपचार और बचाव पर आधारित टेस्ट, ट्रीट एंड टाक (टी-3) अभियान चलाया जा रहा है।

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