उत्तरकाशी। धराली की त्रासदी केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों की अनदेखी का परिणाम भी मानी जा रही है। खीर गंगा से निकली तबाही ने जहां मानव बसावट को मटियामेट कर दिया, वहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि इसमें प्रकृति का कोई दोष नहीं है — गलती हमारी है, जो हमने उसकी राह में बसावट कर ली।
इसरो के सैटेलाइट चित्रों से साफ है कि जलप्रलय का मलबा खीर गंगा के मूल जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट) में जाकर जमा हुआ है। एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. एम.पी.एस. बिष्ट के मुताबिक, श्रीकंठ पर्वत के ग्लेशियर से जुड़ा यह कैचमेंट निचले हिस्से में 50 से 100 मीटर तक फैला है और तीव्र ढाल के साथ सीधे खीर गंगा से जुड़ता है। दशकों पहले भी यहां मलबा जमा था, और अब फिर वही क्षेत्र भर गया है — यानी खीर गंगा ने अपना पुराना रास्ता वापस ले लिया है।
धराली से एक किलोमीटर आगे हर्षिल घाटी में भी यही घटना घटी, लेकिन वहां आबादी न होने से नुकसान नहीं हुआ। प्रो. बिष्ट चेतावनी देते हैं कि अब धराली में खीर गंगा के मूल कैचमेंट क्षेत्र में कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। सरकार को मलबा भरे क्षेत्रों की मैपिंग कर निर्माण पर रोक लगानी होगी, ताकि भविष्य में धराली जैसी त्रासदी दोबारा न हो।
कारटोसेट-3 की भूमिका
आपदा के आकलन में कारटोसेट-3 उपग्रह अहम साबित हुआ है। यह उच्च क्षमता वाला भारतीय इमेजिंग सैटेलाइट 0.25 मीटर पैनक्रोमैटिक और लगभग 1 मीटर मल्टीस्पेक्ट्रल रेजोल्यूशन के साथ दुनिया के सबसे सटीक उपग्रहों में गिना जाता है। इसका उपयोग शहरी योजना, ग्रामीण संसाधन विकास, आपदा प्रबंधन, और रक्षा निगरानी में किया जाता है। धराली आपदा में भी इसी के चित्रों से मलबा प्रभावित क्षेत्र की सटीक पहचान संभव हुई।

