बदरीनाथ। शीतकाल के लिए बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने से पहले होने वाली पंच पूजाओं की प्रक्रिया आज से शुरू हो गई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इन पंच पूजाओं का विशेष धार्मिक महत्व है। माना जाता है कि जैसे ही पंच पूजाएं आरंभ होती हैं, धाम में देवताओं का आगमन शुरू हो जाता है और कपाट बंद होने के बाद छह माह तक बदरीविशाल की पूजा-अर्चना का अधिकार देवताओं को प्राप्त होता है।
गणेश मंदिर से शुरू हुई पंच पूजाएं
कपाट बंद होने से पांच दिन पहले शुरू होने वाली पंच पूजाओं का शुभारंभ आज प्रातः बदरीनाथ भगवान के अभिषेक के साथ किया गया। इसके बाद गणेश मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना हुई। पंच पूजाओं की परंपरा के अनुसार हर दिन धाम के अलग-अलग मंदिरों में अंतिम पूजाएं की जाती हैं और फिर उनके कपाट बंद किए जाते हैं।
पहले दिन गणेश मंदिर में अंतिम पूजा के बाद कपाट बंद कर दिए जाएंगे। दूसरे दिन, 22 नवंबर को आदिकेदारेश्वर मंदिर में अन्नकूट महोत्सव आयोजित होगा, जिसमें भगवान शिव को पके चावलों का भोग लगाया जाएगा और शिवलिंग को अन्नकूट से ढककर मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएंगे।
23 और 24 नवंबर की धार्मिक विधियां
23 नवंबर को सभामंडप में खड़क पुस्तक पूजन और वेद ऋचाओं का वाचन इस सीजन के लिए बंद कर दिया जाएगा।
24 नवंबर को धाम परिसर में माता लक्ष्मी को कढ़ाई भोग अर्पित किया जाएगा और लक्ष्मी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना संपन्न होगी।
25 नवंबर को दोपहर 2:56 बजे बंद होंगे कपाट
बदरीनाथ धाम के कपाट 25 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 56 मिनट पर विधि-विधान के साथ शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाएंगे। इसके साथ ही छह माह तक भगवान बदरीविशाल की पूजा-अर्चना देवताओं के सुपुर्द मानी जाएगी।
छह माह मनुष्यों की और छह माह देवताओं की पूजा
पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल के अनुसार, पौराणिक परंपराओं के अनुसार बदरीनाथ धाम में छह माह तक मनुष्य पूजा करते हैं और शीतकाल में कपाट बंद होने के बाद छह माह पूजा का अधिकार देवताओं को सौंप दिया जाता है। माना जाता है कि पंच पूजाओं के दौरान देवताओं का धाम में प्रवेश आरंभ हो जाता है, और वैशाख माह में कपाट खुलने के बाद पुनः पूजा-अर्चना का दायित्व मनुष्यों को प्राप्त होता है।
बदरीनाथ धाम में शीतकालीन कपाट बंदी की प्रक्रिया पूरे धार्मिक वैभव और परंपरा के साथ जारी है, जिसमें देश-विदेश से आए श्रद्धालु उपस्थित होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।

