Saturday, April 25, 2026
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मेले-तीज-त्योहार : राष्ट्र-जीवन के प्रतीक व हमारी सांस्कृतिक विरासत होते हैं-रतनसिंह किरमोलिया

उत्सव, मेले या तीज-त्योहार जहां हमारी राष्ट्र-जीवन की आशा, आकांक्षा, उत्साह और उमंगों के प्रतीक होते हैं, वहीं ये हमारी राष्ट्रीय संस्कृति और सभ्यता के दिग्दर्शन भी कराते हैं। इनका बार-बार मनाए जाने का मतलब ही है कि आशामय जीवन में आस्था, विश्वास और संकल्प को मजबूती देना। इसीलिए सार्वजनिक उत्सव, मेले, कौथिक, तीज-त्योहार हमारी संस्कृति और सभ्यता के परिचायक होते हैं। इसीलिए ये हमारी सांस्कृतिक विरासत भी हैं। अतः इनका उत्साहपूर्वक एवं उल्लास के साथ मनाया जाना जरूरी है।

अंगरेजों द्वारा भारत को गुलाम बनाए जाने से पहले उन्होंने हमारी सांस्कृतिक एव आध्यात्मिक विरासत को छिन्न-भिन्न किया। हमारी शिक्षा प्रणाली में अपने मनमुताबिक परिवर्तन किया। हमारी भाषा को तिरोहित किया। हमारे जीवन मूल्यों को बदलकर अपनी भाषा,शिक्षा पद्धति एवं पाश्चात्य संस्कृति को हम पर थोपा गया। क्योंकि हमारे लोगों में राष्ट्रीय स्वाभिमान, देशप्रेम, देश और समाज के लिए उनका समर्पण और अपनी भाषा बोली के प्रति प्यार था। आदर्श जीवनमूल्यों से उनका जीवन ओतप्रोत था। उन्हें डिगा पाना अंगरेजों के लिए आसान न था।

इसी बात को मैकाले ने अपनी ब्रिटिश संसद में रखा और भारत को गुलाम बनाने के लिए उन्होंने सबसे पहले हमारी संस्कृति,भाषा एवं जीवनमूल्यों पर प्रहार किया। हमारी सांस्कृतिक विरासत को एवं आध्यात्मिक शक्ति को समाप्त करने के हथकंडे अपनाए। इसी प्रभाव एवं प्रवाह में हमारी सांस्कृतिक विरासत एवं आध्यात्मिक शक्ति बिलाने लगी। धीरे-धीरे हमारे ही लोग हमारी भाषा-बोली और सभ्यता-संस्कृति को गौंण समझने लगे। जिसका इतना गहरा असर पड़ा कि हमारा देश दो सौ साल तक गुलाम बन कर रह गया। उसी का असर है कि आज आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बावजूद हमारे लोग अंगरेजी का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं और न अंगरेजीयत परस्त जीवनशैली को।

परंतु यह अति गर्व की बात है कि हमारे गांव घर हमारी सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक शक्ति को जिंदा रखे हुए हैं। हमारी भाषा-बोली, लोकपरंपराएं हमारे गांव-घरों में प्राणवंत हैं। गांवों की अपेक्षा शहर हमारे इन जीवनमूल्यों को भूलते विसराते जा रहे हैं। आज भी हम यह कह सकते हैं कि इनका परंपरागत स्वरूप को यदि अक्षुण्ण रखा है तो वे हैं हमारे गांव-घर, हमारे ग्राम वासी और गांवों में रहने वाले हमारे अधिसंख्य जनमानस ने। इसलिए हमें अपने गांवों और वहां रहने वाले बाशिंदों पर गर्व होना चाहिए। इस अर्थ में हम उनके ॠणी भी हैं।

यह अत्यंत खेदजनक स्थिति है कि आज धीरे-धीरे गांवों का शहरीकरण हो रहा है। शहरों की तरफ पलायन, पाश्चात्य संस्कृति का बोल बाला, खानपान, रहन-सहन, बोलचाल, अंगरेजी भाषा का भारी मोह और अपनी भाषा का तिरस्कार, नई पीढ़ी का अपनी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत से दूर होते जाना। ये सब लक्षण हमारी इन विरासतों को कहीं न कहीं चोट पहुंचा रहे हैं।

यही कारण है कि भारतीय जीवनमूल्यों के ह्रास का पथ प्रशस्त हो रहा है। इसके फलस्वरूप ही आज हमारे लोगों का दीन-ईमान बदल रहा है। नित्यप्रति नैतिक चारित्रिक पतन हो रहा है। भोगविलास में रुचि-वृद्धि हो रही है और जीवन में भ्रष्टाचार रचबस गया है। आज इस पर गहन चिंतन-मंथन की आवश्यकता है। इसमें सुधार हेतु हमारी शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की दरकार है। इसे हमारी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के अनुकूल बनाया जाना समीचीन होगा।

किसी भी देश की सभ्यता, भाषा और संस्कृति एक दूसरे की पोषक भी होती हैं और एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। यह हमारी संस्कृति का ही प्रभाव है कि जो नर को नारायण बनने के लिए प्रेरित करता है। प्रकृति, संस्कृति और मानव का अंर्तसंबंध सदियों से रहा है। प्रकृति, संस्कृति और अध्यात्म एक दूसरे से संपृक्त हैं। जुड़े हुए हैं। धीरे-धीरे मानव सभ्यता का विकास होता गया। समय बीतते चला गया। न जाने इस संसार में कितने राज्य बने। कितनी जातियां पनपीं और नष्ट होती चली गई। सभ्यता के चरण बढ़ते रहे। समय के प्रभाव और प्रवाह में सब कुछ बनते भी रहा और नष्ट भी होते रहा। नया-नया बनते रहा। पुराना बदलते रहा। आगे भी यह क्रम चलता रहेगा। एक चीज जो आज भी जीवित है, कल भी जीवित थी और कल भी जीवित रहेगी। वह हैं विभिन्न युगों में विभिन्न जातियों और समुदायों की परंपराएं, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्य।

इन्हें जीवित किसने रखा? हमारे इन्हीं तीज-त्योहारों ने। मेले-कौथिकों ने। इन्हीं परंपराओं, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों ने। यही हमारी पहचान है। यही हमारी सभ्यता और संस्कृति है और यही हमारी राष्ट्रीयता भी है। यही है हमारे देश की अनेकता में एकता। यही है वह धागा जो विभिन्न जाति, धर्म, संप्रदाय और उनकी संस्कृतियों के फूलों को गूंथकर देशरूपी माला में सजा कर सुशोभित कर देता है। और हम बड़े गर्व से कहते हैं कि हम भारतीय हैं। यही भारतीयता हमारी पहचान है।

हमारी संस्कृति दुनिया से न्यारी है। हम इस देव संस्कृति भी कहते हैं। इसी के प्रभाव और प्रवाह में हमारे वेदपुराण एवं उपनिषद रचे गए। इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रभाव के कारण भारत विश्व गुरु कहलाया। इसी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में विज्ञान छिपा हुआ था है। तकनीकी ज्ञान छिपा हुआ है। संपूर्ण लोकविज्ञान समाहित है । यह दीगर बात है कि हम उसे कितना आत्मसात करते हैं या कर पाते हैं। कोई न कोई वही शक्ति है जिसने इस पृथ्वी को ही नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड को गतिमान और ऊर्जावान बनाया हुआ है। हमारी भारतीय सांस्कृतिक विरासत एवं आध्यात्मिक शक्ति को आत्मसात करने वाले ॠषि-मुनि,संत-महात्माओं ने विश्व तक को इनकी ज्ञान ज्योति से आलोकित किया और भारत की यशगाथा विश्व में विस्तीर्ण किया। यहां यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि भारत तमाम विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान का स्रोत रहा है।

इसलिए आज जरूरत है भारतीय सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को अक्षुण्ण रखने की। अपनी भाषा-बोली, सभ्यता और जीवनमूल्यों को बचाने की। उन्हें आत्मसात करने की। हमारे मेले, तीज-त्योहार आदि ही हमारी सांस्कृतिक विरासत है। -रतनसिंह किरमोलिया, अणां-गरुड़ (बागेश्वर)

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