लिपुलेख दर्रा से इस जून में भारत और चीन के बीच सीमापार व्यापार फिर से शुरू होने की उम्मीद है। करीब छह साल के अंतराल के बाद शुरू हो रहा यह व्यापार सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के लिए आर्थिक अवसरों के नए द्वार खोलेगा।
कोरोना महामारी और दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव के चलते यह पारंपरिक व्यापार लंबे समय से बंद था। अब मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में दोनों देश आपसी संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, जिसमें लिपुलेख दर्रा अहम भूमिका निभा सकता है।
हालांकि मौद्रिक दृष्टि से यह व्यापार बहुत बड़ा नहीं माना जाता—पहले यह सालाना लगभग 2 से 5 करोड़ रुपये के बीच सीमित रहता था—लेकिन रणनीतिक रूप से इसका महत्व काफी अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मार्ग की पूरी क्षमता का उपयोग किया जाए, तो व्यापार 100 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
इस व्यापार से उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। यहां के किसान और व्यापारी कपड़े, तेल-घी, मसाले और अनाज जैसी वस्तुओं का निर्यात करते हैं। वहीं, तिब्बत क्षेत्र से ऊन, कच्चा रेशम, छिर्बी और सुहागा जैसे उत्पाद आयात किए जाते हैं।
व्यापार के फिर से शुरू होने से सीमापार रहने वाले लोगों के बीच आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, जिससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, बल्कि भारत और चीन के संबंधों में भी नई ऊर्जा आने की उम्मीद है।

