Saturday, March 7, 2026
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उत्तराखंड की इस महिला ने किया ऐसा काम कि कहलाई मदर ऑफ पाकिस्तान

भारत की स्वतंत्रता और पाकिस्तान के जन्म के 75वें वर्ष में नैनीताल और अल्मोड़ा से पाकिस्तान का एक महत्वपूर्ण रिश्ता याद करने लायक है, जिसे इतिहासकारों ने कभी महत्व नहीं दिया और आम लोगों को इसकी ज्यादा जानकारी  हुई नहीं।

यह बेहद रोचक और महत्वपूर्ण तथ्य हैं कुमाऊंनी मूल के परिवार में अल्मोड़ा में जन्मी और नैनीताल में प्रारंभिक शिक्षा पाने वाली आईरीन पंत के। आईरीन पंत ने पाकिस्तान की स्थापना के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

मदर ऑफ पाकिस्तान और पाकिस्तान की फर्स्ट लेडी बनने, राजदूत, गवर्नर और कुलाधिपति बनने से लेकर पाकिस्तान के विकास और महिलाओं के हालात में सुधार के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आईरीन को भारत रत्न के समकक्ष पाकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान निशान-ऐ-पाकिस्तान भी मिला।

सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन सच यही है कि कुमाऊं के पहाड़ी मूल की इस युवती ने पाकिस्तान की स्थापना के आंदोलन में बढ़चढ़ कर भूमिका निभाई। वे न केवल मुहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में पाकिस्तान मूवमेंट कमेटी की पदाधिकारी रहीं, बल्कि इनकी वित्तीय सलाकार भी रहीं। उनका विवाह यूपी लेजिस्लेटिव काउंसिल में उपाध्यक्ष लियाकत अली से हुआ था जो बाद में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने।

शीला आईरीन पंत का जन्म 1905 में अल्मोड़ा के पंत परिवार में हुआ था। उनके पिता डेनियल पंत यूपी सचिवालय में कार्य करते थे। एक वैद्य रहे उनके दादा तारादत्त पंत ने धर्म परिवर्तन कर क्रिश्चियन धर्म अपना लिया था, हालांकि अल्मोड़ा में लोग इस बात से इतने ज्यादा नाराज हुए कि परिवार सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दिया गया। यहां तक कि घटा श्राद्ध की रीति सम्पन्न कर उन्हें जीते-जी मृत तक मान लिया गया। इतिहासकार प्रो. अजय रावत के अनुसार आईरीन के एक भाई एडवर्ड पंत नैनीताल में वन विभाग में कार्यरत थे। उनके पुत्र शेरवुड कॉलेज में लेखाकार और एक पुत्री शीला पंत नैनीताल में बिशप शॉ स्कूल में प्रबंधक व प्रधानाध्यापिका रहीं।

आईरीन पंत शुरू से ही बेहद प्रतिभाशाली और सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर भाग लेने वाली महिला रहीं थीं। लियाकत अली से विवाह के बाद उन्होंने भले ही पाकिस्तान की स्थापना के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन उससे पूर्व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी वे पूरी लगन से सक्रिय रहीं थीं। इसी दौरान उन्होंने 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लियाकत अली का उत्तेजक भाषण सुना जो तब मुजफ्फरनगर क्षेत्र से विधायक थे।

तभी वे उनके प्रति आकर्षित हुईं। आंदोलन के सिलसिले में दोनों की मुलाकात होती रही और 1933 में दोनों ने विवाह कर लिया। हालांकि लियाकत अली पहले से विवाहित थे और एक पुत्र के पिता भी थे। विवाह के लिए उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया और रआना लियाकत अली कहलाई जाने लगीं
आईरीन पंत की जीवनी की लेखिका दीपा अग्रवाल और पाकिस्तान की तहमीना अजीज अयूब ने पुस्तक में तमाम तथ्यों का उल्लेख किया है। इसके अनुसार पाकिस्तान की स्थापना के बाद लियाकत अली, दो पुत्रों अशरफ और अकबर के साथ वे पाकिस्तान चली गईं। लियाकत के प्रधानमंत्री बनने पर उन्हें पाकिस्तान की प्रथम महिला के साथ ही लियाकत मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यक और महिला मामलों की मंत्री का दर्जा भी मिला।
इस दौरान उन्होंने लियाकत के साथ अमेरिका सहित विश्व के तमाम देशों का दौरा किया और अपनी प्रतिभा से विशिष्ट छाप छोड़ी। पुस्तक के अनुसार 1951 में लियाकत अली की हत्या के बाद वे बेसहारा हो गईं, क्योंकि लियाकत कोई भी संपत्ति या धनराशि छोड़ कर नहीं गए थे। वर्ष 1954 में उन्हें नीदरलैंड में पाकिस्तान का राजदूत बनाया गया। छह वर्ष राजदूत रहने के बाद उन्हें इटली में राजदूत बनाया गया। बाद में 1973 में जुल्फिकार अली भुट्टो ने उन्हें सिंध प्रांत का गवर्नर और कराची विवि का कुलाधिपति भी बनाया। वर्ष 1990 में उनका कराची में निधन हुआ।वर्ष 1961 के बाद से उनके तत्कालीन सैन्य प्रशासक प्रधानमंत्री अयूब खान से रिश्ते बेहतर नहीं रहे। लेकिन वे पूर्व में खुद की बनाई संस्था ‘ऑल पाकिस्तानी वीमेंस एसोसिएशन’ (आपवा) के माध्यम से महिला उत्थान के कार्यों में लगी रहीं। उनकी समाज में स्वीकार्यता, प्रभाव और महत्व इतना ज्यादा था कि उनसे मतभेद के बावजूद उनके द्वारा प्रस्तुत महिला सुधारों के मसौदे को अयूब खान को अध्यादेश के जरिये कानूनी दर्जा देना पड़ा। इनमें असीमित बहुविवाह को समाप्त करना, दूसरी शादी से पूर्व वर्तमान पत्नी की सहमति अनिवार्य किया जाना शामिल था। साथ ही तब उनके सुझाव पर पाकिस्तान में तत्कालिक तौर पर तीन तलाक की प्रथा को भी स्थगित किया गया था।

पाकिस्तान की स्थापना से पूर्व आईरीन लियाकत अली के साथ दिल्ली के उस बंगले में रहती थीं जो लियाकत ने उन्हें विवाह के समय उपहार में दिया था और इसका नाम रआना के नाम पर ‘गुल-ए-राना’ रखा था। पाकिस्तान जाते वक्त इस दंपत्ती ने इसे पाकिस्तानी दूतावास के लिए पाकिस्तान को दान कर दिया। वर्तमान में भी पाकिस्तानी दूतावास आईरीन के इसी पूर्व आवास में है।

बचपन से ही बेहद प्रतिभाशाली रहीं आईरीन
बचपन से ही आईरीन पंत बेहद प्रतिभाशाली थीं। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने लखनऊ लालबाग हाईस्कूल और फिर लखनऊ विवि से अर्थशास्त्र में एमए और धार्मिक अध्ययन किया। इस दौरान वे सदैव कक्षा में प्रथम स्थान पर रहीं। यूपी में कृषि में महिला श्रमिकों संबंधी उनकी थीसिस विवि में सर्वश्रेष्ठ मानी गई। तत्कालीन कलकत्ता से उन्होंने प्रथम श्रेणी में टीचर्स ट्रेनिंग प्राप्त की और लगभग दो वर्ष दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में प्रवक्ता भी रहीं।

अंत तक पसंद थी गहत की दाल, दाड़िम की चटनी, लिखा ‘आई मिस कुमाऊं’
आईरीन पंत भले ही बचपन में ही कुमाऊं से चली गई थीं और दुनिया जहान में घूमती रहीं, लेकिन खास कुमाऊंनी स्वाद गहत की दाल और दाड़िम की चटनी हमेशा उनकी पसंद बनी रहीं। दीपा अग्रवाल ने पुस्तक में इसका उल्लेख करते हुए कहा है कि उन्होंने अपने भाई को टेलीग्राम से जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए ‘आई मिस कुमाऊं’ भी लिखा था।

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