राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव जीतने के बाद राहुल उत्साह से लबरेज हैं। वह इन दिनों प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के खिलाफ आक्रामक हैं। उनकी आक्रामकता पर किसी को एतराज नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। लेकिन आक्रामकता में मर्यादा तोड़ने से परहेज करना चाहिए। नि:स्संदेह राहुल ने कैंसर से जूझ रहे गोवा के मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर से मिलकर स्वस्थ राजनीतिक परंपरा का परिचय दिया था। मुलाकात के बाद राहुल का यह दावा करना कि पर्रिकर ने स्वयं कहा कि राफेल डील बदलते समय प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें विश्वास में नहीं लिया, हास्यास्पद है।
नई दिल्ली : पिछले दो दिनों में भारतीय राजनीति के दो विद्रूप चेहरे दिखाई दिए, जो शर्मसार करने वाले हैं। एक चेहरा कांग्रेस के युवा एवं अति उत्साही अध्यक्ष राहुल गांधी का दिखाई दिया, जब वे फिल्म ‘‘उरी’ के डायलॉग ‘‘हाऊ इज द जोश’ से इतने प्रेरित हो गए कि जोश में होश खो बैठे और एक बीमार व्यक्ति को अपनी तुच्छ राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का शिकार बना दिया।
दूसरा हैरत में डाल देने वाला विद्रूप चेहरा प्रेम और मोहब्बत की नगरी आगरा में दिखाई दिया। तीस जनवरी को जब पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्य तिथि पर श्रद्धासुमन भेंट कर रहा था, तब हिंदू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा पाण्डेय ने गांधी के पुतले पर बच्चों के खेलने वाली पिस्तौल से फायर करके गांधी की पुण्य तिथि को शौर्य दिवस के रूप में मनाया। इस पूरे घटनाक्रम की वीडियो रिकॉर्डिग की गई। हालांकि इन दोनों अप्रिय घटनाओं में कोई साम्य नहीं है, लेकिन इनसे पता चलता है कि आखिर देश की राजनीति और समाज कितना पतनशील होता जा रहा है!
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव जीतने के बाद राहुल उत्साह से लबरेज हैं। वह इन दिनों प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के खिलाफ आक्रामक हैं। उनकी आक्रामकता पर किसी को एतराज नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। लेकिन आक्रामकता में मर्यादा तोड़ने से परहेज करना चाहिए। नि:स्संदेह राहुल ने कैंसर से जूझ रहे गोवा के मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर से मिलकर स्वस्थ राजनीतिक परंपरा का परिचय दिया था। मुलाकात के बाद राहुल का यह दावा करना कि पर्रिकर ने स्वयं कहा कि राफेल डील बदलते समय प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें विश्वास में नहीं लिया, हास्यास्पद है।
हालांकि पर्रिकर ने राहुल के बयान को खारिज करके उसकी अहमियत खत्म कर दी है। पर यह सच है कि राफेल सौदे में सरकार से जिस पारदर्शिता की अपेक्षा की गई थी, उसमें वह चूक गई है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट की क्लीन चिट के बावजूद देश के एक बड़े वर्ग में इस सौदे को लेकर अनेक शंकाएं हैं। शायद राहुल को यह विास हो चला है कि तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत के पीछे राफेल की बड़ी भूमिका रही है। इसीलिए वह आगामी आम चुनाव तक इस मुद्दे को जीवित रखना चाहते हैं। चुनावी राजनीति में हार-जीत इसका अनिवार्य पक्ष हैं। लेकिन कांग्रेस, भाजपा समेत अन्य दलों की प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है कि वे राजनीति की स्वस्थ परंपराओं को बचाए रखें।