Saturday, March 7, 2026
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आम चुनाव; एक विश्लेषण : अलग तरह का होगा 2019 का चुनाव – प्रो. यतीन्द्र सिंह सिसोदिया

भाजपा 2019 के चुनाव में निश्चित रूप से अपने द्वारा किए गए कामों एवं लिये गए बड़े नीति-निर्णयों के आधार पर चुनाव मैदान में जाएगी। कांग्रेस कुछ प्रमुख मुद्दों पर भाजपा सरकार के नेतृत्व को घेरने का प्रयास करती रही है। उसकी रणनीति इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द अपने चुनाव प्रचार को केंद्रित करने की होगी। इस चुनाव में निश्चित रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और उसको लेकर सरकार का रवैया और विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं निश्चित रूप से निरन्तर गुंजायमान होगी और यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी बनेगा।

जहां एक ओर इस चुनाव में भाजपा मोदी के सशक्त नेतृत्व को बड़ा आधार बनाने का प्रयास करेगी।अपनी उपलब्धियों के जरिये यह बताने का प्रयास करेगी कि किस तरह से उन्होंने विभिन्न लोक कल्याण की योजनाओं से लोगों को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया। वहीं प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल उनके नेतृत्व के समय के विमुद्रीकरण, जीएसटी, राफेल, बैंकों से ऋण लेकर भागने वाले लोग, युवाओं में बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास करेंगे।
2019 का चुनाव अलग तरह का होगा। जहां एक ओर 2014 के चुनाव में उस समय की सरकार के विरुद्ध कठोर लहर, जन आंदोलन का उभार, युवाओं में असंतोष, घपलों एवं भ्रष्टाचार के आरोप जैसे कई बड़े आधारों की पृष्ठभूमि ने वैकल्पिक नेतृत्व को स्थान उपलब्ध करवाया, जिसको नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने अधिग्रहित किया और चुनाव में अपना एक वैकल्पिक और सुदृढ़ राजनीति का आख्यान निर्मित किया। जनता ने भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को अभूतपूर्व जीत दिलवाई। भाजपा का मत 12 प्रतिशत बढ़ा, जो किसी भी राजनीतिक दल की राष्ट्रीय स्तर पर सफलता का अप्रत्याशित उदाहरण है। कांग्रेस 9.3 फीसद मतों की गिरावट के साथ 44 स्थानों पर सिमट गई और प्राप्त मतों का प्रतिशत केवल 19.3 रहा। 2014 का चुनाव भारतीय संसदीय इतिहास में प्राप्त मत प्रतिशत एवं प्राप्त स्थानों के अनुपात की दृष्टि से किसी भी राजनीतिक दल को सर्वाधिक स्थान प्राप्त होने वाला परिणाम था, जिसका कारण उत्तरी एवं पश्चिमी भारत के लगभग दस राज्यों के 303 में से 243 (80 प्रतिशत) स्थान पर भाजपा को विजय प्राप्त होना था।

सत्तारूढ़ भाजपा 2019 के चुनाव में निश्चित रूप से अपने द्वारा किए गए कामों एवं लिये गए बड़े नीति-निर्णयों के आधार पर चुनाव मैदान में जाएगी। कांग्रेस कुछ प्रमुख मुद्दों पर भाजपा सरकार के नेतृत्व को घेरने का प्रयास करती रही है। उसकी रणनीति इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द अपने चुनाव प्रचार को केंद्रित करने की होगी। इस चुनाव में निश्चित रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और उसको लेकर सरकार का रवैया और विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं निश्चित रूप से निरन्तर गुंजायमान होगी और यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी बनेगा। जहां एक ओर इस चुनाव में भाजपा मोदी के सशक्त नेतृत्व को बड़ा आधार बनाने का प्रयास करेगी।अपनी उपलब्धियों के जरिये यह बताने का प्रयास करेगी कि किस तरह से उन्होंने विभिन्न लोक कल्याण की योजनाओं से लोगों को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया। वहीं प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल उनके नेतृत्व के समय के विमुद्रीकरण, जीएसटी, राफेल, बैंकों से ऋण लेकर भागने वाले लोग, युवाओं में बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास करेंगे। यद्यपि 2014 के विपरीत 2019 के चुनाव व्यापक लहर विहीन, नये मुद्दों, नये आख्यानों एवं नये वैकल्पिक आख्यानों पर आधारित होगा, जिसके कारण यह राष्ट्रीय चुनाव होने के बावजूद विश्लेषण के दृष्टिकोण से 29 राज्यों का चुनाव होगा, जिसका समाकलन राष्ट्रीय परिदृश्य की तस्वीर को स्पष्ट करेगा।

इस चुनाव में भी भाजपा के नेतृत्व वाला राजग, कांग्रेस के नेतृत्व वाला संप्रग और तीसरा घटक होगा। भाजपा की जीत में 2014 में उत्तर प्रदेश (73), मध्य प्रदेश (27), गुजरात (26), राजस्थान (25), महाराष्ट्र (23), बिहार (21), कर्नाटक (17), झारखंड (12), छतीसगढ़ (10), हरियाणा (7), दिल्ली (7), असम (7), पंजाब (6), उत्तराखंड (5), हिमाचल (4), गोवा (2), जम्मू एवं कश्मीर (2) उल्लेखनीय हैं।भाजपा की सर्वाधिक उल्लेखनीय जीत हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हुई है और गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक ने इस संख्या को बढ़ाने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाई है, लेकिन 2014 के पश्चात से लेकर दिसम्बर 2018 तक के विधानसभा चुनावों में कई परिणामों ने नये समीकरणों का जन्म दिया है।

राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश में कांग्रेस की वापसी 2019 में नये मतों के विभाजन की ओर संकेत करती हैं, जो हिंदी भाषी राज्यों में कांग्रेस के 2014 के पूरे सफाये के विपरीत चुनौतिपूर्ण स्थिति की संभावना का संकेतक है। उत्तर प्रदेश में नये गठबंधन एवं विपक्ष की लामबंदी भाजपा के लिए चुनौती और चिंता का बड़ा कारण हो सकती है। दक्षिण में कर्नाटक के अतिरिक्त भाजपा की उपस्थिति लगभग नगण्य है। ऐसे में तमिलनाडु में जहां मतदाताओं का सत्तारूढ़ दल के विपरीत जनादेश का दीर्घकालिक अनुभव डीएमके की वापसी की संभावना को प्रबल करता है। भाजपा के प्रमुख घटक दलों में जदयू, शिवसेना, एआईएडीमके, अकाली दल, लोजपा अदि है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह गठबंधन अपने पूर्ववर्ती प्रदर्शन से 2019 में कहां ठहरता है?भाजपा अपनी पूर्ववर्ती मजबूत उपस्थिति वाले राज्यों के अतिरिक्त पश्चिम बंगाल एवं ओडिशा में विशेष रूप से जोर लगा रही है। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या हिंदी भाषी राज्यों में होने वाले संभावित घाटे की भरपाई यहां से हो पाएगी? कांग्रेस के लिए 2019 का चुनाव खोई हुई राजनीतिक प्रतिष्ठा को स्थापित करना है और अपने लिए सत्ता में वापसी का पुरजोर प्रयास करना है। कांग्रेस के पास अपने 2014 के निम्नतम प्रदर्शन से एक उल्लेखनीय छलांग लगाने का अवसर है। विशेष रूप से हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अपनी प्रतिष्ठा को पुनस्र्थापित करने एवं अपने लिए तालिका में आंकड़ों की वृद्धि करने की सम्भावना है।

कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग में सर्वाधिक संभावना डीएमके की दिखाई पड़ती है एवं राजद, जेडीएस तथा एनसीपी का योगदान भी हो सकता है। भाजपा के नेतृत्व वाले राजग द्वारा 2014 अति उल्लेखनीय प्रदर्शन के समय भी तीसरे घटक अथवा अन्य के पास 147 स्थान थे। ऐसे में 2019 के चुनाव में यह समूह यदि एकीकृत होता है, उसके किसी भी तार्किक परिणीति पर नहीं पहुंचने के बावजूद 2019 के चुनाव में इनकी भूमिका को किसी भी तरह से कमतर करके नहीं आंकी जा सकती।

सपा, बसपा, टीएमसी, बीजेडी, टीआरएस, टीडीपी जैसे सभी राजनीतिक दल मिलकर अन्य घटक दलों के पिछले 147 के आंकड़े से आगे भी निकल सकते हैं। ऐसे में 2019 के चुनाव की पूर्व पीठिका कई संभावनाएं प्रस्तुत करती हैं। यद्यपि राजग की संभावनाओं में ज्यादा पैनापन है तथा संभव है कि सभी मिलकर 272 के जादुई आंकड़े को प्राप्त कर ले। यदि ऐसा नहीं होता है तो फिर कई विकल्प उभरेंगे, जिनमें तीसरे घटक दलों की भूमिका अहम हो जाएगी। साथ ही कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए को प्राप्त कुल स्थान यदि तीसरे घटक दलों से ज्यादा होते हैं तो एक नए समीकरण के बनने की संभावना भी विद्यमान रहेगी।

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