देहरादून। दून की बेटी और स्क्वाड्रन लीडर वैशाली भंडारी ने देश और उत्तराखंड का नाम रोशन किया है। वह तीनों सेनाओं की नौ महिला अधिकारियों के उस ऐतिहासिक दल का हिस्सा रहीं, जिसने पहली बार संयुक्त रूप से समुद्र की वैश्विक परिक्रमा पूरी की। स्वदेशी नौका आईएनएसवी त्रिवेणी पर सवार दल ने करीब 10 महीने में 25,500 नॉटिकल मील की दूरी तय की।
अभियान के दौरान दल ने हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और दक्षिण अटलांटिक की चुनौतीपूर्ण समुद्री परिस्थितियों का सामना किया। इस दौरान ऑस्ट्रेलिया के फ्रेमैंटल, न्यूजीलैंड के लिटलटन, अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स और दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में पड़ाव किए गए। दल ने भूमध्य रेखा को दो बार पार करने के साथ ही केप लीविन और केप हॉर्न जैसे चुनौतीपूर्ण समुद्री क्षेत्रों को भी पार किया।
तेज हवाओं और ऊंची लहरों के बीच नौका को आगे बढ़ाना अभियान की बड़ी चुनौतियों में शामिल रहा। लंबे समय तक समुद्र में रहना, मौसम के बदलते मिजाज के बीच त्वरित निर्णय लेना और सीमित संसाधनों में आपसी तालमेल बनाए रखना भी दल के लिए परीक्षा से कम नहीं था। तमाम चुनौतियों के बावजूद दल ने सफलतापूर्वक अपना अभियान पूरा किया।
गत माह मुंबई लौटे दल का रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वागत किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी दल से मुलाकात कर इस असाधारण उपलब्धि के लिए महिला अधिकारियों को सम्मानित किया। वैशाली की इस उपलब्धि से देहरादून समेत पूरे उत्तराखंड में गर्व का माहौल है।
एनसीसी ने जगाई सैन्य सेवा की रुचि
वैशाली भंडारी ने डालनवाला स्थित दून इंटरनेशनल स्कूल और केंद्रीय विद्यालय ओएनजीसी से शिक्षा हासिल की। इसके बाद उन्होंने डीएवी पीजी कॉलेज से स्नातक किया। कॉलेज के दौरान एनसीसी प्रशिक्षण ने उनके व्यक्तित्व में अनुशासन विकसित करने के साथ सैन्य जीवन के प्रति रुचि पैदा की।
इसके बाद उन्होंने हैदराबाद स्थित वायुसेना अकादमी से प्रशिक्षण प्राप्त किया और भारतीय वायुसेना की अकाउंट्स शाखा में अधिकारी के रूप में कमीशन हासिल किया।
पिता के निधन के बाद भी नहीं डिगा हौसला
वैशाली के इस मुकाम तक पहुंचने के सफर में परिवार के संघर्ष की कहानी भी जुड़ी है। उनके पिता राजन भंडारी का करीब आठ वर्ष पहले निधन हो गया था। वह अमूल पार्लर चलाते थे, जिसे अब परिवार ने किराये पर दे रखा है। उनकी मां भारती भंडारी गृहिणी हैं। बड़ी बहन प्रियंका की शादी हो चुकी है, जबकि छोटा भाई हर्षद अमेरिका में इंजीनियर है।
वैशाली की उपलब्धि यह संदेश देती है कि अनुशासन, साहस और दृढ़ संकल्प के साथ मुश्किल से मुश्किल लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है। उनकी ऐतिहासिक समुद्री यात्रा ने न केवल भारतीय महिला अधिकारियों की क्षमता को दुनिया के सामने रखा, बल्कि दून और उत्तराखंड का मान भी बढ़ाया है।

