हरकी पैड़ी का नाम कैसे पड़ा :- जिस हरकी पैड़ी पर करोड़ों तीर्थ यात्री कुंभ स्नान करने आते हैं क्या आप जानते हैं उसका नाम कैसे हरकी पैड़ी रखा गया। हरकी पैड़ी का प्राचीन नाम उज्जैन के राजा भर्तृहरि के नाम पर भर्तृहरि की पैड़ी था। भर्तृहरि ने राजपाट त्यागकर वर्तमान हरकी पैड़ी के ऊपर वाली पहाड़ी पर बैठकर वर्षों तपस्या की थी। भर्तृहरि जिस मार्ग से उतरकर गंगा स्नान के लिए आते थे, उस पर भर्तृहरि के भाई राजा विक्रमादित्य ने सीढ़ियां बनवाई। उन सीढ़ियों को भर्तृहरि की पैड़ी नाम दिया गया। कालांतर में यही पैड़ियां हरकी पैड़ी के नाम से विख्यात हुई। इसी स्थल पर कुंभ आदि महापर्वों के स्नान होते हैं। राजा भर्तृहरि ने यहीं बैठकर कालजयी नीति शतक और वैराग्य शतक की रचना की।ईसा से 57 वर्ष पूर्व जब भर्तृहरि ने राजपाट त्यागकर हरिद्वार का गंगातट अपनाया तब विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ। भर्तृहरि मनसा देवी पर्वत के ठीक उस भाग पर तपस्या कर रहे थे, जो ब्रह्मकुंड हरकी पैड़ी के ऊपर है। वे रोजाना गंगा स्नान के लिए आते। छठी शताब्दी में कुंभ देखने हरिद्वार आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इन्हें भर्तृहरि की पैड़ी कहकर संबोधित किया। भर्तृहरि के नाम का आधा हरि शब्द लेकर हरकी पैड़ी नाम पड़ा। भर्तृहरि के नाम से एक गुफा आज भी इसी पर्वत के नीचे अपर रोड स्थित नाथों के दलीचे में मौजूद हैं। विक्रमादित्य के दरबार के रत्न महाकवि कालिदास ने अपने विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य मेघदूत में इस स्थल और कनखल का वर्णन किया है।
जानिए कैसे पड़ा विश्वप्रसिद्ध हरि की पैड़ी का नाम
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