क्या? जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय वामपंथी बौद्धिकों का ‘एनिमल फार्म’ है-शंकर शरण 

  1. जेएनयू की प्रभावी बौद्धिकता देशवासियों से ही नहीं, सामान्य बुद्धि से भी दूर रही है.
  2. लंबे समय से वामपंथी दबदबे का रहस्य सामाजिक शिक्षा के राजनीतिकरण में है.
  3. अनुच्छेद 370 हटाने पर जब पूरे देश में उत्साह है, तब जेएनयू में मातम क्यों? 
  4. किसी वामपंथी प्रोफेसर या छात्र-नेता ने दलित, मुस्लिम, हिन्दुत्व, दंगे या उत्पीड़न का ठोस अध्ययन करने की परवाह नहीं की. न संपूर्ण आंकड़े जुटाकर तुलनात्मक मूल्याकंन किया जिस से प्रमाणित हो कि कौन, कहां, कैसे, वंचित या वंचक है.

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने पर जब पूरे देश में उत्साह है, तब जेएनयू में मातम क्यों? अभी वहां हुए छात्र-संघ के संभावित चुनाव परिणामों से भी वही सूचना मिली है. तमाम वामपंथियों में आपसी मतभेद जो हों, किन्तु हिन्दू-विरोध व इस्लाम-परस्ती पर उन की सहमति राष्ट्रीय विखंडन को समर्थन देने तक जाती है. चाहे वे इसे स्पष्ट न मानें, किन्तु उन से बात करके देखें. वे दो मिनट में ही बोल उठते हैं: राष्ट्रीय एकता ‘सो ह्वाट?’ हिन्दू चिंता ‘ह्वाट रबिश!’

कहने को किन्हीं वंचितों, पीड़ितों के हित के लिए ऐसी बातें कही जाती है. किन्तु स्थिति उलटी है. हिन्दू धर्म-समाज की खिल्ली उड़ाना और भारत को विखंडित करना, या होने देना मूल बात है. शोषितों, वंचितों वाली लफ्फाजी उस के लिए बौद्धिक बहाना है. किसी वामपंथी प्रोफेसर या छात्र-नेता ने दलित, मुस्लिम, हिन्दुत्व, दंगे या उत्पीड़न का ठोस अध्ययन करने की परवाह नहीं की. न संपूर्ण आंकड़े जुटाकर तुलनात्मक मूल्याकंन किया जिस से प्रमाणित हो कि कौन, कहां, कैसे, वंचित या वंचक है. इसीलिए, जुल्म या अन्याय पर किसी पक्की कसौटी की बात से ही उन्हें एलर्जी है. वे मनमानी निंदा-भर्त्सना की छूट चाहते हैं. वे बनी-बनाई हिन्दू-विरोधी, आर.एस.एस.-भाजपा विरोधी मान्यताओं के वफादार हैं. उन्हें तथ्यों से मतलब नहीं, अथवा वहीं तक है जितना उन के पूर्वाग्रह-ग्रस्त निष्कर्षों को समर्थन मिलता लगे.

आखिर वही प्रोफेसर या छात्र सिनेमा, खेल, भोजन, फैशन, आदि में सब की तरह ठोस मानकों को अपनाते हैं. मामूली एक्टरों या खिलाड़ियों को महान, या बासी भोजन को श्रेष्ठ नहीं मानते. तब ठीक ज्ञान क्षेत्र में – जो छात्र या अध्यापक रूप में उन का मुख्य कार्य-क्षेत्र है–ऐसी उलट-बांसी की कोई कैफियत नहीं! कि वे ज्ञान के बदले अंधकार फैलाने वाले एजेंटों में बदल जाएं. पूरे विश्वास से ‘भारत तेरे टुकुड़े होंगे,इन्शाअल्लाह!’ जैसे एक्टिविज्म का बचाव, और राष्ट्रीय अखंडता चाहने वालों की खिल्ली उड़ाना दुश्मनों के हाथों खेलना ही है.

इसीलिए, जेएनयू जॉर्ज ऑरवेल के ‘एनिमल फार्म’ सा दृश्य उपस्थित करता है. कम्युनिस्ट रूस में समानता, स्वतंत्रता, न्याय, शान्ति, युद्ध, आदि धारणाओं की वही दुर्गति हुई थी, जैसी यहां आजादी, सेक्यूलर, कम्युनल, इन्क्लूसिव, दलित, हिन्दुत्व, आदि की हो रही है.

इन धारणाओं की जेएनयू में विचित्र समझ उसे वैसा ही ‘पशु-बाड़ा’ दिखाती है, जहां दुनिया का वास्तविक बोध नहीं है. इसीलिए वे सहजता से, यहां तक कि गर्व से मुहम्मद अफज़ल, याकूब मेमन या अजमल कसाब का उल्लेख करते हैं. वहां के अनेक प्रोफेसर, छात्र मानो विदेशियों की तरह आम भारतीयों को मूढ़ (बेवकूफ) समझते हैं वरना कोर्ट से दंडित आतंकियों को ‘उत्पीड़ित’ बताने की कोई व्याख्या नहीं हो सकती.

जेएनयू की प्रभावी बौद्धिकता देशवासियों से ही नहीं, सामान्य बुद्धि से भी दूर रही है. सामाजिक-राजनीतिक शब्दावली का ऐसा विचित्र अर्थ कर लिया गया है जो मानक शास्त्र के विपरीत और अपने देश-समाज के प्रति लापरवाह है.

वहां लंबे समय से वामपंथी दबदबे का रहस्य सामाजिक शिक्षा के राजनीतिकरण में है. यह संबंधित विषयों के सिलेबस, पाठ्य-सूची, गोष्ठी-सेमिनार के विषय, आदि से झलकता है. स्वतंत्रता, समानता, न्याय, विविधता, एकता, भेद-भाव, शान्ति, क्रान्ति, आतंक, मानवीयता, आदि धारणाएं इन्हीं विषयों से जुड़ी हैं. साइंस के पदों के विपरीत इन सामाजिक पदों को मनमाने व्याख्यायित किया जा सकता है. इसीलिए वहां सोशल साइन्स को धीरे-धीरे पूरी तरह हिन्दू-द्रोही, इस्लाम-परस्त और देश-विखंडन समर्थक मतवाद में बदल दिया गया. इसे भोले-भाले कमसिन लड़के-लड़कियों को अनोखी शब्दावली, आधिकारिक कोर्स व अकेडेमिक जिल्द में परोसा जाता है. कैंपस के सुखद ‘अलग’ वातावरण में वही बेसिर-पैर और हानिकर बातें कुछ लड़के-लड़कियों पर अफीम सी चढ़ती हैं. आम जनगण से विलगाव को ‘जनवाद’ और जिहादियों को ‘उत्पीड़ित’ कहना उसी के उदाहरण हैं.

जेएनयू में इतिहास, साहित्य, राजनीति, आदि में शिक्षा नहीं, इंडॉक्ट्रीनेशन होता रहा है. यानी किसी मतवाद का आग्रही बनाने का कार्य. यह भोले छात्रों के साथ विश्वासघात है, जो वहां दशकों से हो रहा है. इस के बिना स्थाई वामपंथी दबदबा बना रहना असंभव होता.

यह सब जेएनयू में इतने खुले रूप में होता रहा है कि बहुतों को विश्वास नहीं होगा कि ऐसा घात भी संभव है. पर इस बिन्दु पर तमाम रेडिकलों के प्रिय नोआम चोमस्की के विचार देखें – ‘मतवादीकरण की प्रक्रिया और गतिविधि को ठीक से समझना सब से जरूरी कर्तव्य है. तानाशाही शासन वाले देशों में इसे देख पाना बड़ा आसान है, किन्तु ‘स्वतंत्रता में मगजधुलाई’ की व्यवस्था देख पाना बड़ा कठिन है जिस में हम मजबूर किए जाते हैं, और जिस के कई बार हम अनजाने उपादान बन जाते हैं.’

यह बात चोमस्की ने लोकतांत्रिक सरकारों के लिए कही थी, किन्तु वह जेएनयू जैसे स्वायत्त अकादमिक टापू पर भी सही उतरती है. जहां विविध कम्युनिस्टों, माओवादियों, जिहादियों ने अपने अड्डे बना लिए हैं. इन्होंने अपने मतवाद को ‘शिक्षा’ का जामा पहनाने में स्वतंत्रता का वही दुरूपयोग किया, जो चोम्सकी का आशय है. जैसे घर का गंदा पानी बाहर करने के लिए जो नाली बनाई जाती है, बाढ़ आने पर उसी से गंदा पानी अंदर भी आ जाता है. उसी तरह, जो स्वायत्तता ज्ञान-साधना को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए दी गई थी, उसी के दुरुपयोग से जेएनयू, तथा कई स्वायत्त शैक्षिक संस्थाओं को, हिन्दू-विरोधी या भारत-विरोधी किले में बदल डाला गया है.

हमें सोवियत अनुभव से सीखना चाहिए था कि वहां दशकों तक कम्युनिस्ट मतवादीकरण को ‘सामाजिक शिक्षा’ मानने के क्या-क्या दुष्परिणाम हुए? यहां उसी रूसी मतवाद के अनुयायियों को जेएनयू बनाने का अवसर मिल गया था! उस का कुपरिणाम हमें देख सकना चाहिए.

(लेखक हिंदी के स्तंभकार और राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं)

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