गूगल के डूडल में छाये पंडित नैन सिंह रावत ने बिना तामझाम के 19वीं शताब्दी में पूरा तिब्बत नाप लिया

 

अंग्रेज सरकार ने 1877 में बरेली के पास 3 गांवों की जागीरदारी उन्हें उपहार स्वरूप दी। इसके अलावा उनके कामों को देखते हुए कम्पेनियन ऑफ द इंडियन एम्पायर का खिताब दिया गया। देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया मै आज भी नैन सिंह रावत की साहस भरी गाथा दर्ज है।

देहरादून : नैन सिंह रावत ने बिना किसी तामझाम के 19वीं शताब्दी में पूरा तिब्बत नाप लिया था। यही नहीं उन्होंने हिमालय की लंबी-लंबी पैदल यात्राएं कर दुनिया इसकी खूबियों से वाकिफ कराया। रावत का सम्मान अंग्रेजी हुकुमत के लोग भी करते थे। उन्होंने बिना किसी आधुनिक उपकरण के पूरे तिब्बत का नक्शा तैयार किया था। उस खतरनाक समय में जब तिब्बत में किसी विदेशी के पकड़े जाने पर मौत की सजा दी जाती थी। ऐसे हालात के बावजूद नैन सिंह रावत ने न सिर्फ यहां पहुंचे, बल्कि केवल रस्सी, कंपास, थर्मामीटर और कंठी के जरिए पूरा तिब्बत नाप कर आ गए। उस जमाने में पंडित उन्हें कहा जाता था, जो पढ़े लिखे होते थे। इसलिए नैन सिंह रावत के ज्ञान के आधार पर नाम के आगे पंडित लगाया गया।  डेढ़ दशक पहले भारत सरकार ने उनपर डाक डिकट भी जारी किया था।

अंग्रेजों के सामने थी तिब्बत का नक्शा तैयार करने की चुनौती 

19वीं शताब्दी में अंग्रेज़ भारत का नक्शा तैयार कर रहे थे। वह लगभग पूरे भारत का नक्शा बना चुके थे। वे आगे बढ़ते हुए तिब्बत का नक्शा चाहते थे, लेकिन फॉरबिडन लैंड कहे जाने वाली इस जगह पर किसी भी विदेशी के जाने पर मनाही थी। ऐसे में किसी भारतीय को ही वहां भेजने की योजना बनाई गई। इसके लिए लोगों खोज शुरू हुई। आखिरकार 1863 में कैप्टन माउंटगुमरी को दो ऐसे लोग मिल ही गए।

इनमें से एक थे उत्तराखण्ड निवासी पंडित नैन सिंह और उनके चचेरे भाई मानी सिंह। दोनों को देहरादून में सर्व ऑफ इंडिया में प्रशिक्षण दिया गया।  उस समय दिशा और दूरी नापने के यंत्र काफी बड़े हुआ करते थे, लेकिन उन्हें तिब्बत तक ले जाना कठिन और चुनौतीपूर्ण था। इनके साथ दोनों के पकड़े जाने का भी खतरा था। ऐसे में तय हुआ कि दिशा नापने के लिए छोटा कंपास और तापमान नापने के लिए थर्मामीटर इन्हें को सौंपा जाएगा। दूरी नापने के लिए नैन सिंह के पैरों में 33.5 इंच की रस्सी बांधी गई, ताकि उनके कदम एक निश्चित दूरी तक ही पड़ें। हिंदुओं की 108 की कंठी के बजाय उन्होंने अपने हाथों में जो माला पकड़ी वह 100 मनकों की थी, ताकि गिनती आसान हो सके।

इस मिशन में भाई असफल रहे पर नैन सिंह ने यात्रा जारी रखी 

1863 में दोनों भाइयों ने अलग-अलग राह पकड़ी। नैन सिंह रावत काठमांडू के रास्ते और मानी सिंह कश्मीर के रास्ते तिब्बत के लिए निकले। मानी सिंह इसमें असफल रहे और वापस आ गए, लेकिन पंडित नैन सिंह रावत ने अपनी यात्रा जारी रखी।

नैन सिंह सफलतापूर्वक तिब्बत पहुंचे और पहचान छिपाने के लिए बौद्ध भिक्षु के रूप में वहां घुल-मिल गए। उन्होंने तिब्बती भाषा भी सीखी। उन्हें अंग्रेजी और फारसी का भी अच्छा ज्ञान था। वह दिन में शहर में टहलते और रात में किसी ऊंचे स्थान से तारों की गणना करते। नैन सिंह रावत ने ही सबसे पहले दुनिया को ये बताया कि लहासा की समुद्र तल से ऊंचाई कितनी है। उन्होंने ब्रहमपुत्र नदी के साथ लगभग 800 किलोमीटर पैदल यात्रा की और दुनिया को बताया कि स्वांग पो और ब्रह्मपुत्र एक ही नदी है। उन्होंने दुनिया को तिब्बत के कई अनदेखे और अनसुने रहस्यों से रूबरू कराया। 1866 में नैन सिंह रावत मानसरोवर के रास्ते भारत वापस आ गए।

अंग्रेज सरकार भी मानती थी नैन सिंह रावत के साहस का लौहा 

साल 1867-68 में वह उत्तराखण्ड में चमोली जिले के माणा पास से होते हुए तिब्बत के थोक जालूंग गए, जहां सोने की खदानें थीं। उनकी तीसरी बड़ी यात्रा साल 1873 -74 में की गई शिमला से लेह और यारकंद की थी। उनकी आखिरी और सबसे अहम यात्रा साल 1874-75 में हुई, जिसमें वे लद्दाख से लहासा गए और फिर वहां से असम पहुंचे। इस यात्रा में नैन सिंह रावत ऐसे इलाकों से गुजरे, जहां दुनिया का कोई आदमी नहीं पहुंचा था।

पंडित नैन सिंह रावत के इस काम को ब्रिटिश राज में भी सराहा गया। अंग्रेज सरकार ने 1877 में बरेली के पास 3 गांवों की जागीरदारी उन्हें उपहार स्वरूप दी। इसके अलावा उनके कामों को देखते हुए कम्पेनियन ऑफ द इंडियन एम्पायर का खिताब दिया गया। देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया में आज भी नैन सिंह रावत की साहस भरी गाथा दर्ज है।

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